देश की माटी, देश का जल...कविता

सुनील कुमार ,मालीघाट, जिला मुजफ्फरपुर (बिहार ) से रवीन्द्रनाथ ठाकुर की एक कविता सुना रहे हैं जिसका अनुवाद भवानीप्रसाद मिश्र ने किया था :
देश की माटी ,देश का जल-
देश की माटी देश का जल-
हवा देश की देश के फल-
सरस बनें प्रभु सरस बने-
देश के घर और देश के घाट-
देश के वन और देश के बाट-
सरल बनें प्रभु सरल प्रभु-
देश के तन और देश के मन-
देश के घर के भाई -बहन-
विमल बनें प्रभु विमल बनें...

Posted on: Apr 26, 2017. Tags: SUNIL KUMAR

स्वच्छ भारत अभियान के तहत बन रहे शौचालय तेज हवा में ही टूट जा रहे है बरसात में क्या होगा...

ग्राम-देवरी, जिला-सूरजपुर (छत्तीसगढ़) से कैलाश सिंह पोया बता रहे हैं कि देवरी और पकनी गांव में सरकार द्वारा शौचालय का निर्माण हो रहा है जिसका ठेका दिया गया है पर अधिकारी घर के लोगों से ही काम करवा रहे हैं और घटिया सामग्री से निर्माण होने के कारण अभी तेज़ हवा के कारण कई शौचालय टूट चुके है तो उनका कहना है कि बारिश में तो पूरा ध्वस्त ही हो जायेगा, अच्छे से खुदाई और ईट की जोड़ाई न होने के कारण ये हो रहा है, निर्माण कार्य करने वाली एजेंसी ही इसके लिए जिम्मेदार है, अत:सीजीनेट के सभी श्रोताओं से निवेदन है कि दिए हुए नम्बरों में फोन कर दबाव बनायें एस.डी.एम.@09424166557, सरपंच@7772511742 जिससे स्थिति सुधर सके.पोया@9644545195

Posted on: Apr 26, 2017. Tags: KAILASH POYA

गजब दुःख पायो रे भैया, बढा के परिवार गजब दुःख पायो...गीत

ग्राम-लोढ़ी, पोस्ट-लोढ़ी, जिला-शहडोल (मध्यप्रदेश) से रोहित पनिका छोटे परिवार को प्रोत्साहित करता एक गीत सुना रहे हैं :
गजब दुःख पायो रे भैया-
बढा के परिवार गजब दुःख पायो –
छुटकु के बीस दिन बंद है पढाई-
बडकू के मुड़ पिराय,टोरिया के कान पकय-
छोटकु ला बोले दादा लान दे मिठाई-
बडकू ला बोले दादा लान दे दवाई...

Posted on: Apr 26, 2017. Tags: ROHIT PANIKA

जागो जागो रे आदिवासी, सरकार कर की छीना हमर हक़ अधिकार...गीत

कैलाश सिंह पोया, ग्राम-देवरी, जिला-सूरजपुर, (छत्तीसगढ़) से एक गीत सुना रहे है:
जागो जागो रे, आदिवासी मोर-
सरकार कर की छीना हमर हक़ अधिकार-
जाग रे हमर आदिवासी भाई, सरकारी हमर हक़ अधिकार लहान छीना-
जागा, जागा रे आदिवासी भाई, अधिकार हमर लहान अपनावा-
कुर्सी पर बैठल अधिकारी, देखन भर नही आवे-
कुर्सी पर बैठल अधिकारी, देखन भर नही आवे, बाथरूम हवा महन गिर जाए-
जागो जागो रे, आदिवासी मौर, अपन अधिकार ला पहचाना...

Posted on: Apr 26, 2017. Tags: KAILASH SINGH POYA

गले में और कितने लटकाएँ कंकाल, हम हैं तमिलनाडु के किसान...कविता-

मालीघाट ,मुजफ्फरपुर (बिहार) से सुनील कुमार सरला माहेश्वरी की कविता सुना रहे है:
हम हैं तमिलनाडु के किसान-
गले में और कितने-
लटकाएँ कंकाल-
और कितने दिन-
अधनंगे, नंगे-
धरती को बना थाली-
पेट को रखें ख़ाली-
कितने दिन मुँह में दबाएँ-
चूहे और घास-
बन जाए लाश-
अपने ही पेशाब से बुझाएँ प्यास-
तब तुम मानोगे-
हम हैवान-
काले भूत नहीं-
पहनें हैं खेतों में जली-
अपनी ही खाल-
बदहाल-
जीवित इंसान-
तमिलनाडु के किसान-
अभी कहाँ निकला कोई हल-
अभी कहाँ खाया-
हमने अपना मल-
कितनी हदें हैं-
तुम्हारी बेशर्मी की-
अभी देखना बाकी है वे पल...

Posted on: Apr 25, 2017. Tags: SUNIL KUMAR

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