तीर सहेंगे हम बेचारे...कविता-

ग्राम-मालीघाट, जिला-मुजफ्फरपुर (बिहार) से सुनील कुमार श्याम अंकुर की रचना सुना रहे है :
तीर सहेंगे हम बेचारे-
बोलो कब तक बोलो कब तक-
कितनी सदियाँ बीत गयी पर-
जुल्म अभी भी जारी है-
घाव भरे हैं तब से अब तक-
आके के अब बेकारी है...

Posted on: Aug 18, 2019. Tags: BIHAR KUMAR MUZAFFARPUR POEM SUNIL

छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ की एक नृत्य कला : कठसाठ -

ग्राम-मालीघाट, जिला-मुजफ्फरपुर (बिहार) से सुनील कुमार छत्तीसगढ़ में होने वाले नृत्य कला के विषय में जानकरी दे रहे हैं| भारत में हर जगह अलग-अलग नृत्य कला के प्रकार हैं| इसी प्रकार छत्तीसगढ़ में अबूझमांड में होने वाली नृत्य कला कठसाठ इन्ना इनमे से एक है इसमें युवक व युवतियां माघ के पर्व में नाचते हैं| कठसाठ कसना से बना है| कसना का अर्थ खेलना होता है| जिसमें ख़ुशी से देवी-देवता नाचते या खेलते हैं| जिसे कठसाठ कहते हैं| गोंडी में इसे माडी कठसाठ इन्ना कहते हैं| युवक कमीज, कोट, बनियान, पंख, दर्पण, भूतमाला माला पहनते हैं, कौड़ी माला व पंख युतिया पहनती है| जो बहुत जयादा प्रभावित होने पर प्रेम सूत्र में भी बंध जाते हैं| सुनील कुमार@9308571702.

Posted on: Aug 16, 2019. Tags: BIHAR MUZAFFARPUR STORY SUNIL KUMAR

अफरादक अरपज जखन बना देची...जनवादी गीत-

मालीघाट, मुजफ्फरपुर (बिहार) से सुनील कुमार मिथला में एक जनवादी गीत सुना रहे हैं :
अफरादक अरपज जखन बना देची-
मोती में जिनगी हम अपन चारा नैची-
कठिन इहा छे कोनो घर से पज्जा दा-
अंगना में आंगन हम दीप जरा लैची-
मुसकिल ये हमारा लै महा जे परिंदा छै...

Posted on: Aug 13, 2019. Tags: BIHAR MUZAFFARPUR SONGS SUNIL KUMAR

आपन देशवा के लोगवा के जगावे के परी...जागरूकता गीत-

मालीघाट, जिला-मुजफ्फरपुर (बिहार) से सुनील कुमार एक जागरूकता गीत सुना रहे हैं:
जगावे के परी ओ जगावे के परी-
आपन देशवा के लोगवा के जगावे के परी-
बगावे के परी ओ बगावे के परी-
आपन देशवा से शराब के बगावे के परी-
भईया हो मत उदास करा जिंदगी के आश-
आपन रोगवा के जांच करावे के परी...

Posted on: Aug 06, 2019. Tags: BIHAR MUZAFFARPUR SONG SUNIL KUMAR

होली पर्व का एक किस्सा...

मालीघाट, जिला-मुजफ्फरपुर (बिहार) से सुनील कुमार बता रहे है कि अकबर हुमायु, जहाँगीर, शाहजहाँ, बहादुर शाह, जफर होली आने के पहले से ही रंग उत्सव की तैयारी शुरू कर देते थे | अकबर के महल में सोने और चंडी के बड़े-बड़े बर्तन में केवे और केसर युक्त रंग घोला जाता था| राजा अपनी बेगम और सुन्दरियों के साथ होली खेलते थे| शाम को महल में ठंडाई और मिठाई पानी इलाइची से मेहमानों का सिखबाल होता था | मुसायरे, कव्वालियो नृत्य गानों की महफ़िल जमती थी| इतिहास में जिक्र है कि जहाँगीर के समय में भी महफ़िल एक होली का भी भव्य कार्यक्रम होता था| साधारण नागरिक भी बादशाह पर रंग डालते थे शाहजहाँ तो होली को ईद गुलाबी के रूप मनाये करते थे|

Posted on: Aug 05, 2019. Tags: BIHAR MUZAFFARPUR STORY SUNIL KUMAR

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