अच्छा हुआ मैं किसान ना हुआ, सपने सच नही होते...किसान पर कविता

कोयला क्षेत्र बिजुरी,मध्यप्रदेश से अनवर सुहैल कृषि पर एक कविता सुना रहे हैं :
अच्छा हुआ मैं किसान न हुआ, सपने सच नही होते – सपने सच नही होते तो क्या सपने देखे नही जाये-
औरों से मुझे क्या मैं तो देखना चाहता हूँ – उन खेतों में लहलहाती धान की बालियाँ – जिनमे कुछ दिनों पहले ढेर सारी-
श्रम बालाओं ने की थी धान की रोपाई-
जिनके गीत के बोल अब भी-
गूंज रहे हैं खेतों के मेंढ़ों पर – ये सच है कि सपने सच नही होते –
लेकिन झूठ ही सही इन सपनो से दिखती आशाओं की दीप-
माना कि एक और बारिश आ जाती तो-
इस वर्ष भी हम क्या इस समय बैठे होते हाथ पर हाथ धरे – बल्कि खलिहान की कर रहे होते मरम्मत – सोमारू की दाई कूबड़ वाली कमर लिए – लीपती होती गोबर लिए खलिहान –
सोमारू खलिहान के चारो ओर रुंध रहा होता बाड़ी-
और बांस से बना रहा होता छोटा सा मचान – ताकि पक कर जब धान की बालियाँ आयें-
तो हो पूरी सुरक्षा अन्न और धन की – मैं जानता हूँ कि सपना है – खेत की तरफ ताकने से अब होती है पीड़ा – जैसे कि सब हो गया हो ख़त्म सिवाय इस एक स्वप्न के – एक राज की बात बताउं –
सपने अब यथार्त से डरावने आने लगे हैं – जिनमे सूखे खेत पैरों की दीवारों से फटी धरती-
कंकाल बने ढोर पशु और इन सब के बीच – चील कौओं से घिरी एक किसान की मृत देह – और जब मैं पास गया तो देखा – अरे ये तो मेरी ही देह है – और अब मैं रात रात भर जागते रहता हूँ – कि कही फिर से आ ना जाये ये डरावने सपने-
सपने सच नही होते तो क्या सपने देखे नही जाये – अच्छा हुआ मैं किसान ना हुआ...

Posted on: Apr 17, 2016. Tags: Anwar Suhail

कुछ भी नही बदला दोस्त,कुछ भी नही बदला

कुछ भी नही बदला दोस्त,कुछ भी नही बदला दोस्त
आकाश उतना ही पुराना है,जंगल,पगडंडी,पहाड पुराने हैं उतने ही
फिर कैसे कहते हो तुम कि दृश्य बदले हैँ
चीजें बदली हैं,कुछ भी नही बदला दोस्त
बदले हैं सिर्फ़ हम तुम
वरना पंख भी वही हैं,हवाएं रूत उडान भी वही हैँ ,
हवस,लालच,बदले की आग वही है
नफ़रत,लूट,खसोट,धोखा,अन्धविश्वास वही है
फिर कैसे कहते हो कि जमाना बदल गया है
हिटलर अब भी हैं कुछ भी नही बदला
और अब भी गोयवल्स घूम रहा है ,
अब भी नौजवान हथियार उठा रहे हैं,
अब भी कवि खौफजदा हैं
अब भी बद्तमीजियां,उद्ददंडताए,शंखनाद बजा रही हैँ ,
मान भी जाओ दोस्त कुछ भी नही बदला।
कुछ भी नही बदला...

Posted on: May 11, 2014. Tags: Anwar Suhail

सब कुछ वैसा ही हो जाए

सब कुछ वैसा ही हो जाए
जैसा हमने चाहा था
जैसा हमने सोचा था
जैसा सपना देखा था
लेकिन वैसा कब होता है
थका हारा भूखा सोता है
तुम हम सबको बहलाती हो
नाहक सपने दिखलाते हो
अपने पीछे दौड़ाते हो गुर्राते हो धमकाते हो
और हमारे दिल में बात यही भरते रहते हो
सब कुछ वैसा ही हो जाएगा
जैसा हम चाहा करते हैं
जैसा हम सोचा करते हैं
हमने बात उनकी की
लेकिन देखो गौर से देखो इन बच्चो की आँखों में
शंकाओ के संदेहो के कितने बादल तैर रहे है
बेशक बालिग होकर ये सपनो के
उन हत्यारो का सारा तिलस्म तोड़ डालेंगे
बेशक अच्छे दिन आयेंगे
तब हम मिलकर गायेंगे गीत विजय के दोहराएंगे ।
गीत विजय के दोहराएंगे ।

Posted on: Dec 14, 2013. Tags: Anwar Suhail

हमे बताया जा रहा है कि हम कितने महत्वपूर्ण हैं...

हमे बताया जा रहा है
कि हम कितने महत्वपूर्ण हैं
कि हमारी एक ऊँगली के दबाव से
बदल सकती है उनकी किस्मत
कि हमें ही लिखनी है किस्मत उनकी
इसका मतलब हम भगवान् हो गए.....
वे बड़ी उम्मीदें लेकर आते हैं हमारे पास
उनके चेहरे पर दीनता तैरती है
जैसे एक नया भिखारी सकुचाता है
शर्माता है
गिडगिडाता है
मायूस, मासूम, मजबूर दिखने का
सफल अभिनय करता है
हम उनके फरेब को समझते हैं
और एक दिन उनकी झोली में
डाल आते हैं...
एक अदद वोट.....
फिर उसके बाद
भक्त अपने भगवानों को भूल जाते हैं....

Posted on: Nov 16, 2013. Tags: Anwar Suhail

बंटे हुए घर की तस्वीर...रजत कृष्ण की एक कविता

इस साझे घर की दीवारें
हिलने डुलने लगीं हैं अब
अक्सर टकरा उठते हैं आपस में
छोटे बड़े बर्तन सभी
और बंद हों जाते हैं
दरवाजे खिडकियाँ
टकराहट शुरू होती है
और खाली तसले सा कांपने लगता है
८० वर्षीय बाबा का तन बदन
अब रतियाँ सुनाई पडती हैं
देव खोली में सिसकियाँ
पुरखों यह कुटुम्ब जो जुड़ा रहा आपस में मया के तागे से
यह मेरी साँसों तन
राहट में गूंजता है
अंतरनाद दादी का
जनम से साझेपन को जीता आया
एक कवि ने कई रातों के नींद का बोझ लिए
बंटे हुए घरों की बस्ती में भटक रहा है

Posted on: Oct 06, 2012. Tags: Anwar Suhail

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