Why was Jharkhand created, asks a displaced person...

Rajkumar from Jharkhand Visthapit Berojgar Morcha ( Committee of diplaced unemployeds) in Dhanbad asks why was the state created. He says we gave our land but got no compensation and jobs. When we did strike cases were put against us. No one has time to listen to us. We have decided that we will not give any land to companies and we will throw out existing companies as Mamta Banerjee did in Singur. For more Rajkumar Ji can be reached at 09661156574

Posted on: Mar 01, 2012. Tags: Rajkumar

आतंकवादी...एक कविता

वे रात के अँधेरे में आये , मुझे ले गये
और बंद किया किसी कमरे के अँधेरे में
और कई दिनों तक पूछते रहे सवाल
जिक्र किया किसी बिस्फोट का
और मेरी हड्डियों में तलाशा अपनी बेंत से कोई सुराग
उन्हें लगा कि मेरे सीने में पल रही है कोई साजिश
तो नंगा किया मुझे
मेरा शरीर जीता जागता सबूत बना सत्ता के कारनामों का
पर अदालतें उनकी थी, गुनाहगार मैं ही ठहरा
जिरह हुई, पर मैं नहीं था चर्चा में
नेशनल इंटिग्रिटी को बार-बार उछाला गया हवा में
और मैं किसी बकरे की तरह कठघरे में खड़ा चुपचाप,
सोचता रहा राशन के बकाया के बारे में
बनियें का खुर्राट चेहरा और मेरी बीबी का झांकना बार-बार खाली कनस्तर को
बच्चे स्कूल छोड़ देंगे क्या? वह घर कैसा होगा जहाँ मेरी हाजिरी नहीं है,

खिड़की का जाला साफ हो गया हो शायद,
पर टूटा हुआ आइना अब भी वहीं होगा जिसे मैं बदलने वाला था
बारिश भी आनेवाली है, क्या घर टपकना कम हो जायेगा ?
अम्मी को नींद नहीं आयेगी, खटिये पर खांसती रहेगी रात भर,
दवाई लेने अस्पताल कौन जायेगा ?
सजा-ए-मौत की मांग हुई, मेरे लिये, एक आतंकवादी के लिये,
देश भक्ति का बाजार गर्म हुआ, अच्छा व्यापार हुआ
न्यूज़ और डिस्काउंट के बीच न्यूज चैनल ने बेचा सरकारी झूठ
होममिनिस्ट्री ने सुरक्षा इंतजाम के पुखते वादे किये
आर्म्स के फ्रेश आर्डर दिए गये विदेशी एजेंसियों को
स्विस बैंक के गुप्त खाते में हेर फेर हुआ
मेरे खिलाफ एक ग्लोबल वार छिड़ गया
दुनियां के सारे मुनाफाखोर एक हुए
डायलेश में एक शानदार पार्टी हुई
बिल को सील किया गया कि, मेरी लाश से निकले तेल को कौन कितना पीयेगा ?
अपनी खुमारी में हुक्मरानों ने फरमान जारी किया ,
कि मेरी मौत उपलब्धी है मानवता के लिये,
विश्व प्रेम व शांति के लिये जरूरी है ,
हाँ, निहायत ही जरूरी है ,
पूंजी के वृद्धि के लिये सड़कपर मर जाना
जरूरी है किसानो का नरसंहार भी, कि मौनसेंटो धन कम सकें
मजदूरों का भूखों मरना भी जरूरी है, कि देश का डी.जी.पी. बढ़ता रहे
और जरूरी है हिंदुस्तान के मुसलमान का हाशिये पर होना भी
कि बंटवारे की राजनीति बनी रहे,
ये बंटवारा नहीं है मेरे दोस्त, ये शोषण हमारी नियति है
तिल-तिल मरना हमारा कि वो और भी अय्याश हो जाएँ ! -अजय साव मुंबई

Posted on: Jan 19, 2012. Tags: Himanshu Kumar

फिर जला दिये गये आदिवासियों के गाँव...एक कविता

फिर जला दिये गये आदिवासियों के गाँव
इस उम्मीद में कि जमीन , नदी और पहाड़ को न बेचने की संस्कृति मर जायेगी ,
फिर वो राख उड़ी और जम गयी विजेताओं की संततियों के मस्तिष्क में ,
और उसने उन सब के मस्तिष्क को कुंद बना दिया ,
फिर श्रेष्ठ जातियों ने पढ़े कुछ प्राचीन श्लोक और सिद्ध किया कि वसुधा एक कुटुंब है ,
फिर पूरी वसुधा के सारे विजेता एक कुटुंब हो गये ,
फिर विजेताओं ने लिखे इतिहास ,
जिसमे कहीं नहीं थे
आदिवासी युवतियों की प्रेम कहानियाँ ,
युवकों के फौलादी बाजुओं की मछलियों की दास्तानें,
न नदियाँ थीं , न पहाड़ , न वसंत ,न मेला ,न चूड़ी ,

विजेताओं ने
बनाये भव्य स्मारक
इस युद्ध में शहीद हुए सिपाहियों के
जिसमे सिपाहियों के
नाक बहाते गरीब बच्चों का जाना मना था ,
फिर बुद्धिमान लोगों ने अनुमान लगाये ,
सांस्कृतिक विरासत की रक्षा को क्या क्या खतरे बाकी हैं अभी ,

कुछ सिरफिरों ने कोशिश की सर उठाने की ,
पर कुचल दिये गये,
इतने महान देश के लोकतंत्र से टकराना मजाक है क्या ?
लोकतंत्र की रक्षा में सारी श्रेष्ठ जातियां एक हो गयीं ,
बागी बुरी तरह मारे गये,
कुछ भी तो नहीं था उनकी तरफ ,
न धर्म
न संस्कृति ,
न राजनीति ,
कुछ जंगलियों के समर्थन से
क्रांति करने चले थे ,

कुछ निष्पक्ष लोगों ने ,
विश्लेषण प्रस्तुत किये
राष्ट्र के सम्मुख जिसमे
ऐसा आभास दिया गया था
कि ये क्रांति को भी अच्छी तरह समझते हैं
पर असल में इन्होने ही तो बताये थे
बागियों के खात्मे के गुर
विजेताओं को

हिमांशु कुमार

Posted on: Jan 17, 2012. Tags: Himanshu Kumar

कलम तभी तक कलम है जब तक सच लिखे...श्याम बहादुर नम्र की कविता

कलम कलम है
लेकिन तभी तक कलम है
जब तक सच लिखे
उसके लिखे में झूठ न दिखे
कलम बिकाऊ नहीं होती
बिकी हुई कलम बिलकुल टिकाऊ नहीं होती
क्योंकि बिकते ही वो वस्तु हों जाती है
उसकी सारी अस्मिता खो जाती है
कलम फूल है
सिद्धांत की टहनियों पर काँटों में भी हंसती मुस्कुराती है
लेकिन तोड़ लिए जाने पर
भगवान के माथे पर भी मुरझा जाती है
कलम तभी तक कलम है
जब तक सिद्धांत की साख पर रहे
कलम तभी तक कलम है
जब तक वो सच लिखे
सच कहे
कलम अंकुर की तरह कोमल है
नितांत कोमल
लेकिन पत्थर का भी सीना चीरकर उग आती है
झूठ के घने अँधेरे में
सच के दिए सी टिमटिमाती है
कलम रोशनी है दिए की
बिकते ही बुझ जाती है
कलम कभी किसी को नहीं छलती
कलम कभी लीक पर नहीं चलती
ईर्ष्या से नहीं जलती
इसलिए हारकर भी हाथ नहीं मलती
कलम न डरती है
न डराती है
किसी पर धौंस नहीं जमाती है
वो ब्लैकमेल नहीं करती
सच की खातिर टूट जाए
फिर भी नहीं मरती
लेकिन वो बिकाऊ हाथों में अपार कष्ट सहती है
मुक्ति के लिए छटपटाती है
उन हाथों से अपने हर लिखे पर शर्माती है
क्योंकि वो वस्तु नहीं बनाना चाहती
किसी भी दाम पर नहीं बिकना
क्योंकि कलम कलम है
लेकिन तभी तक कलम है
जब तक सच लिखे
उसके लिखे में झूठ न दिखे

श्याम बहादुर नम्र

Posted on: Jan 10, 2012. Tags: Himanshu Kumar

तुम तरुण हो या नहीं...श्याम बहादुर नम्र की एक कविता

तुम तरुण हो या नहीं
तुम तरुण हो या नहीं यह संघर्ष बतायेगा ,
जनता के साथ हो या और कहीं यह संघर्ष बतायेगा ।
तुम संघर्ष में कितनी देर टिकते हो ,
सत्ता के हाथ कबतक नहीं बिकते हो ?
इससे ही फैसला होगा – कि तुम तरुण हो या नहीं – जनता के साथ हो या और कहीं ।
तरुणाई का रिश्ता उम्र से नहीं, हिम्मत से है,
आजादी के लिए बहाये गये खून की कीमत से है ,
जो न्याय-युद्ध में अधिक से अधिक बलिदान करेंगे,
आखिरी साँस तक संघर्ष में ठहरेंगे ,
वे सौ साल के बू्ढ़े हों या दस साल के बच्चे – सब जवान हैं ।
और सौ से दस के बीच के वे तमाम लोग ,
जो अपने लक्ष्य से अनजान हैं ,
जिनका मांस नोच – नोच कर
खा रहे सत्ता के शोषक गिद्ध ,
फिर भी चुप सहते हैं, वो हैं वृद्ध ।
ऐसे वृद्धों का चूसा हुआ खून
सत्ता की ताकत बढ़ाता है ,
और सड़कों पर बहा युवा-लहू
रंग लाता है , हमें मुक्ति का रास्ता दिखाता है ।
इसलिए फैसला कर लो
कि तुम्हारा खून सत्ता के शोषकों के पीने के लिए है,
या आजादी की खुली हवा में,
नई पीढ़ी के जीने के लिए है ।
तुम्हारा यह फैसला बतायेगा
कि तुम वृद्ध हो या जवान हो,
चुल्लू भर पानी में डूब मरने लायक निकम्मे हो
या बर्बर अत्याचारों की जड़
उखाड़ देने वाले तूफान हो ।
इसलिए फैसले में देर मत करो,
चाहो तो तरुणाई का अमृत पी कर जीयो ,
या वृद्ध बन कर मरो ।
तुम तरुण हो या नहीं यह संघर्ष बतायेगा ,
जनता के साथ हो या और कहीं यह संघर्ष बतायेगा ।
तुम संघर्ष में कितनी देर टिकते हो ,
सत्ता के हाथ कबतक नहीं बिकते हो ?
इससे ही फैसला होगा – कि तुम तरुण हो या नहीं – जनता के साथ हो या और कहीं ।

– श्याम बहादुर नम्र

Posted on: Jan 05, 2012. Tags: Himanshu Kumar

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