आतंकवादी...एक कविता
वे रात के अँधेरे में आये , मुझे ले गये
और बंद किया किसी कमरे के अँधेरे में
और कई दिनों तक पूछते रहे सवाल
जिक्र किया किसी बिस्फोट का
और मेरी हड्डियों में तलाशा अपनी बेंत से कोई सुराग
उन्हें लगा कि मेरे सीने में पल रही है कोई साजिश
तो नंगा किया मुझे
मेरा शरीर जीता जागता सबूत बना सत्ता के कारनामों का
पर अदालतें उनकी थी, गुनाहगार मैं ही ठहरा
जिरह हुई, पर मैं नहीं था चर्चा में
नेशनल इंटिग्रिटी को बार-बार उछाला गया हवा में
और मैं किसी बकरे की तरह कठघरे में खड़ा चुपचाप,
सोचता रहा राशन के बकाया के बारे में
बनियें का खुर्राट चेहरा और मेरी बीबी का झांकना बार-बार खाली कनस्तर को
बच्चे स्कूल छोड़ देंगे क्या? वह घर कैसा होगा जहाँ मेरी हाजिरी नहीं है,
पर टूटा हुआ आइना अब भी वहीं होगा जिसे मैं बदलने वाला था
बारिश भी आनेवाली है, क्या घर टपकना कम हो जायेगा ?
अम्मी को नींद नहीं आयेगी, खटिये पर खांसती रहेगी रात भर,
दवाई लेने अस्पताल कौन जायेगा ?
सजा-ए-मौत की मांग हुई, मेरे लिये, एक आतंकवादी के लिये,
देश भक्ति का बाजार गर्म हुआ, अच्छा व्यापार हुआ
न्यूज़ और डिस्काउंट के बीच न्यूज चैनल ने बेचा सरकारी झूठ
होममिनिस्ट्री ने सुरक्षा इंतजाम के पुखते वादे किये
आर्म्स के फ्रेश आर्डर दिए गये विदेशी एजेंसियों को
स्विस बैंक के गुप्त खाते में हेर फेर हुआ
मेरे खिलाफ एक ग्लोबल वार छिड़ गया
दुनियां के सारे मुनाफाखोर एक हुए
डायलेश में एक शानदार पार्टी हुई
बिल को सील किया गया कि, मेरी लाश से निकले तेल को कौन कितना पीयेगा ?
अपनी खुमारी में हुक्मरानों ने फरमान जारी किया ,
कि मेरी मौत उपलब्धी है मानवता के लिये,
विश्व प्रेम व शांति के लिये जरूरी है ,
हाँ, निहायत ही जरूरी है ,
पूंजी के वृद्धि के लिये सड़कपर मर जाना
जरूरी है किसानो का नरसंहार भी, कि मौनसेंटो धन कम सकें
मजदूरों का भूखों मरना भी जरूरी है, कि देश का डी.जी.पी. बढ़ता रहे
और जरूरी है हिंदुस्तान के मुसलमान का हाशिये पर होना भी
कि बंटवारे की राजनीति बनी रहे,
ये बंटवारा नहीं है मेरे दोस्त, ये शोषण हमारी नियति है
तिल-तिल मरना हमारा कि वो और भी अय्याश हो जाएँ ! -अजय साव मुंबई
