कलम तभी तक कलम है जब तक सच लिखे...श्याम बहादुर नम्र की कविता
कलम कलम है
लेकिन तभी तक कलम है
जब तक सच लिखे
उसके लिखे में झूठ न दिखे
कलम बिकाऊ नहीं होती
बिकी हुई कलम बिलकुल टिकाऊ नहीं होती
क्योंकि बिकते ही वो वस्तु हों जाती है
उसकी सारी अस्मिता खो जाती है
कलम फूल है
सिद्धांत की टहनियों पर काँटों में भी हंसती मुस्कुराती है
लेकिन तोड़ लिए जाने पर
भगवान के माथे पर भी मुरझा जाती है
कलम तभी तक कलम है
जब तक सिद्धांत की साख पर रहे
कलम तभी तक कलम है
जब तक वो सच लिखे
सच कहे
कलम अंकुर की तरह कोमल है
नितांत कोमल
लेकिन पत्थर का भी सीना चीरकर उग आती है
झूठ के घने अँधेरे में
सच के दिए सी टिमटिमाती है
कलम रोशनी है दिए की
बिकते ही बुझ जाती है
कलम कभी किसी को नहीं छलती
कलम कभी लीक पर नहीं चलती
ईर्ष्या से नहीं जलती
इसलिए हारकर भी हाथ नहीं मलती
कलम न डरती है
न डराती है
किसी पर धौंस नहीं जमाती है
वो ब्लैकमेल नहीं करती
सच की खातिर टूट जाए
फिर भी नहीं मरती
लेकिन वो बिकाऊ हाथों में अपार कष्ट सहती है
मुक्ति के लिए छटपटाती है
उन हाथों से अपने हर लिखे पर शर्माती है
क्योंकि वो वस्तु नहीं बनाना चाहती
किसी भी दाम पर नहीं बिकना
क्योंकि कलम कलम है
लेकिन तभी तक कलम है
जब तक सच लिखे
उसके लिखे में झूठ न दिखे
श्याम बहादुर नम्र
