भोपाल में तो हमने गैस की ही तीन अवस्थाएं देखीं...

जानते हैं हम
होती हैं तीन अवस्थाएं, पदार्थ की
ठोस, तरल और गैस
पर
भोपाल में तो हमने
गैस की ही तीन अवस्थाएं देखीं |
एक गैस, जो रिसी गैस की तरह
उड़ी और फैली भी गैस की ही तरह
सब कुछ तबाह भी किया उसने
किसी जहरीली गैस की ही तरह |
यही गैस, तरल बन के बही
और अब भी बह रही है हजारों आँखों से
कुछ में ऐनक चढ़ गए, कुछ नहीं सहेज सकीं रोशनी को
यही गैस, अभी भी कारखाने के नीचे
बह रही है, धडक रही है उस पानी के सीने में |
यही गैस अब जम गई है सीने में, पत्थर की तरह
29 बरस की सरकारी बेरुखी देखकर
लहू जम गया है शिराओं में
धमनियां कराह रही हैं, फेफड़े गल रहे हैं
हड्डियाँ धनुष की मानिंद हो चली हैं
जिन पर राजनेता प्रत्यंचा चढ़ा रहे हैं बरसों से |
गैस की ये तीनों अवस्थाएं
कई पीढ़ियों में अपना जहर फैला चुकी हैं
और बढ़ रही हैं जमीन के नीचे
नेस्तनाबूद करने को कई और पीढ़ी |

Posted on: Dec 03, 2013. Tags: Prashant Dubey

पेडों के साथ गई, पेडों की छाँव रे : नर्मदा आंदोलन को समर्पित एक गीत

देखो देखो देखो देखो, उजड़ गए गाँव रे ।
पेडों के साथ गई, पेडों की छाँव रे॥
हम माझी बन खेते रहे, समय की धार को ।
जाने काये डुबो दई, हमरी ही नाव रे॥

खेत हमरा जीवन है, धरती हमरी माता है।
इनसे हमारा सात जन्मों का नाता है॥
बांध तुम बनाते हो, हमें क्यूँ डुबाते हो।
हमारे खेतों में क्यूँ, बारूदें बिछाते हो॥
अपने स्वार्थ को विकास कह के तुमने। 2
हमरा तो लगा दिया, जीवन ही दाँव रे॥
पेडों के साथ गई........................................।

पुरखों से जीव और, हम साथ रह रहे।
पत्थरों को चीर कर, प्रेम झरने बह रहे॥
हम जंगल में जीते हैं, हमें क्यूँ भगाते हो।
पर्यावरण के झूठे आंसू क्यों बहाते हो॥
हमरी रोजी,हमरी बस्ती छीन कर सरकार ने ।
अपनों से दूर कर, कैसा दिया घाव रे॥
पेडों के साथ गई........................................।

प्रशांत दुबे

Posted on: Oct 18, 2010. Tags: Prashant Dubey

दिल्ली में अब काम नहीं, क़ाम-न-वेल्थ है

सर पर गठरी
हाथ में छोटे से बच्चे की छोटी छोटी उंगलियां और एक बच्चा गोद में
सूखा पडा गांव में, जीने की कोई गारंटी नहीं

वहां खचाखच भरा प्लेटफॉर्म, और दिल्ली जाने की मची है होड
पारा चालीस पार, स्टेशन पे पानी नहीं
असमंजस में मां, कि पानी ढूंढे या रेल
मैली कुचैली सी एक थैली में एक छोटी सी पोटली
और उस पोटली में छुपा है एक खजाना
चालीस रूपए के कुछ बंधे नोट और कुछ एक सिक्के
और साथ में है बासी रोटियों का खजाना
जब जब बिलखेंगे बच्चे, देखेंगे मां की ओर बढी हुए आंख से
दे दी जाएगी चूसने को यही रोटी लॉलीपॉप की तरह

रेल आई, वह कब चली, पता नहीं, भीड तो बहुत थी
कहने को तो रेल बहुत बडी थी, बीस डिब्बे रहे होंगे
पर उसे और उसके जैसों के लिए दो ही डिब्बे थे
एक इंजन से लगा और एक पीछे को

जब झपकी खुली तो मथुरा में कुछ गिनती चल रही थी
लोगों की
सबको उतारा जा रहा है वहीं पर
क्योंकि दिल्ली में अब काम नहीं है
वहां काम-न-वेल्थ है
वह खडी है प्लेटफार्म पर और सोच रही है कि जाए तो जाए कहां
क्योंकि दिल्ली में अब काम नहीं क़ामनवेल्थ है

प्रशांत दुबे

Posted on: Oct 13, 2010. Tags: Prashant Dubey

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