कांग्रेस से आई जनता से आई...लोक कविता -
ग्राम-देवरी, जिला-सूरजपुर (छत्तीसगढ़) से कैलाश सिंह पोया एक लोक कविता सुना रहे है:
कांग्रेस से आई जनता से आई-
लोकदल से आई भंडारा के बदली हो जाई-
समाजवाद बबुवा धीरे-धीरे आई-
रूबल से आई डॉलर से आई-
देशवा के नाने धराई हो-
समाजवाद बबुवा धीरे-धीरे आई...
Posted on: Nov 14, 2017. Tags: KAILASH SINGH POYA SONG VICTIMS REGISTER
समाजवाद बबुवा धीरे धीरे आई...समाजवाद पर गीत -
ग्राम-देवरी,जिला-सूरजपुर (छत्तीसगढ़) से कैलाश सिंह पोया एक गीत सुना रहे हैं :
समाजवाद बबुवा धीरे धीरे आई – हाथी में आई हो घोड़ा में आई – अंग्रेजी बाजा बजाई समाजवाद बबुवा धीरे-धीरे आई – आंधी से आई अंधारी से आई-
धीरे ला से घर पे समाई-
मौका से आई धोखा से आई...
Posted on: Nov 11, 2017. Tags: KAILASH SINGH POYA SONG VICTIMS REGISTER
हमारे दो गाँवों के बीच के वन और श्मशान भूमि को काट कर भूमि पर अवैध कब्जा किया जा रहा है...
ग्राम-देवरी, जिला-सूरजपुर (छत्तीसगढ़) से कैलाश पोया बता रहे हैं कि महुआ पारा देवरी और चंदोरा के बीच रखात है इसे केराझेरिया कहते है ये एक बड़ी भूमि है जिसमे सब को मिट्टी भी दिया जाता है इस जगह पर दूसरे गांव के राजन और जीतू नाम के दो व्यक्ति अवैध कब्जा कर खेती करते हैं और घर बना के रह रहे हैं सांथ ही धीरे-धीरे वनों को काट कर इस जगह पर कब्जा कर रहे हैं इसलिए सांथी सीजीनेट के सुनने वाले साथियों से अपील कर रहे हैं कि दिए गए नंबरों पर अधिकायों से बात कर निवेदन करे जिससे वन भूमि पर हो रहे अवैध कब्जे को रोका जा सके : दरोगा@8889472625, CEO@9424238613, कलेक्टर@07075266117. कैलाश पोया@9753553881.
Posted on: Nov 09, 2017. Tags: KAILASH POYA SONG VICTIMS REGISTER
कांग्रेस भाजपा राज आई, दुनिया ला बिना मारे मरवाई...कविता
ग्राम-देवरी, जिला-सूरजपुर (छत्तीसगढ़) से कैलाश सिंह पोया एक कविता सुना रहे है:
कांग्रेस भाजपा राज आई-
दुनिया ला बिना मारे मरवाई-
डी एपी यूरिया ला खाद बनवाई-
फसल अनाज सब में डलवाई-
देश विदेश ले कम्पनी दलाल मंगाई-
यहाँ के मूलनिवासी मनकर-
जमीन जायजाद इज्जत लुटवाई-
अन्न में दवाई ला डलवाई-
दुनिया कर जीवन ला बिना मारे मरवाई...
Posted on: Nov 08, 2017. Tags: KAILASH SINGH POYA SONG VICTIMS REGISTER
सेवा जोहार भूल गए आदिवासी रे रीति रिवाज...आदिवासी गीत -
ग्राम-देवरी, जिला-सूरजपुर (छत्तीसगढ़) से कैलाश सिंह पोया एक कविता सुना रहे है:
सेवा जोहार भूल गए आदिवासी रे रीति रिवाज-
माता पिता के जोहार छोड़े रीति रिवाज-
दूसरे के रीति अपनाए आदिवासी रे-
भूल गए रीति के रिवाज-
सेवा जोहार भूल गए आदिवासी रे रीति रिवाज...
