Awareness campaign needed for welfare schemes for handicapped
Virendra Verma says government has many schemes for handicapped people but people do not know about these schemes and can not take help of these facilities. Reservation of 3% in jobs also does not get filled by handicapped candidates. He says government should run awareness programs so that handicapped people come to know about the welfare schemes and how to approach them
Posted on: Dec 28, 2010. Tags: Virendra Verma
नागपुरी कविता हेजाय गेलक हीरानागपुर का हिंदी अनुवाद
खो गया हीरानागपुर
मिट रहा सरना
धँस रहा मसना
गाँव का चुआँ
खलिहान का कुंबा
पूरा घर, पूरा बखरी
नहीं मिलते अब तो
एक भी रूगड़ा-खुखड़ी,
सहिया-मितान मददत
गोतिया-गुइया भी (रिश्ते-नाते)
अब तो बेधड़क
बोलने लगे हैं भाषा जापानी,
मुर्गा का बांग
ढेंकी का
ढाँकू चाँ-ढाँकू चाँ
पतल में डबकते
धान की धमक
नहीं दिखते अब तो
मोर,तोता आउर पोस मैना,
मड़ुवा रोटी, पीठा
धुसका, सकरपाला
नहीं मिलते अब तो
अपना देश का गुलगुला
वन-पहाड़, टोंगरी-पतरा
घूमते रहते थे
सियार, बाघ, भालू
चोंचा चिड़िया का घोंसला,
नहीं मिलते अब तो
हँसली-पौंची गले की सिकरी,
करया-फेटा,लुगा-झूला
हल-कुदाल फार
खुरपी-पाटा
सगरगाड़ी पितामाह का कंधा,
नहीं मिलते अब तो
एक भी पहर भांफा कंदा,
जतरा-मेला
रामढेलुवा-झूला
कुमना,बारहा
जांता-चाला
मोरहा, पटिया
बच्चों की खाट
नहीं मिलते अब तो
नापा-जोखा, सेरहा पैला,
अम्बा, जामुन, डउह, कटहल
पीले बांस की हड़ुवा-करील
सुरगुजा, ठेपा, कुदरूम
लाले-लाल तूंत पातले
नहीं मिलते अब तो
गोलगोला साग चाकोढ़ गुड़ा,
घड़ा-खपड़ा
कुंआ-तालाब
डमकच-अधरतिया
राग अंगनई
नहीं सुनाते अब तो
अखाड़े में
तांग-तांग धातिंग तांग...!
वीरेन्द्र महतो की मूल नागपुरी कविता का हिंदी अनुवाद स्वयं कवि द्वारा
Posted on: Dec 10, 2010. Tags: Virendra Mahato
School clerk takes money to open bank account from adivasi girls
Virendra Mahato from Ranchi is talking about a case of a school clerk taking Rs 70 from adivasi girls to open their bank account in State Bank to receive their stipends. He says all these girls are children of poor parents who have collected this money from their manual work which has been misused by the school administration
Posted on: Dec 08, 2010. Tags: EDUCATION VIRENDRA MAHATO
सिर में दउरा, पीठ में बच्चा : नागपुरी कविता का हिंदी अनुवाद
सिर में दउरा, पीठ में बच्चा
भटका रहा रफ्ता-रफ्ता,
जब से हुई सयानी
पड़ गया पीछे
बड़ा-बड़ा राजघराना,
गाँव-घर की बहू-बेटियों को
बनाया अपना अशियाना,
देख, भूखे भेड़ियों ने
नोच-चोथ
उजाड़ दिया जीवन सारा,
रखे थे छुपा
दिल में कईं-कई सपने
तोड़ दिए सब एक ही झटके में,
माँ-बाबा के अरमानों का
कर दिया खून
कतरा-कतरा,
तन ढ़कने को भी
नहीं मिल रहा अब तो चिथड़ा,
फूटी किस्मत ले
धुकुड़-धुकुड़ अपना जीना,
कभी ईंट भðें में,
कभी रेस्तरॉ में,
कभी वैश्यशाला में,
कभी नचनी घर में,
तो कभी चौक-चौराहे में,
जल रही है,
तप रही है,
लूट रही है,
जीवन के हर मोड़ में,
जल रहा तन-मन
सूखी डालियों सा,
जिन्दगी जैसे जिंदा लाश बन
सिर्फ जिये जा रही,
नारी होने का दर्द झेल रही,
पुरखो की आस को
मगर नहीं नहीं छोड़ रही,
आज नहीं तो कल
बजेगा फिर से अखड़ा में मांदर,
होगा पूरे गाँव में
सुख-चैन और अमन,
सूखी हाड़-मांस में
फिर से लौट आएगी हरियाली,
यही सोच जी रही
( मूल नागपुरी से हिन्दी अनुवाद भी लेखक वीरेन्द्र महतो द्वारा)
