सिर में दउरा, पीठ में बच्चा : नागपुरी कविता का हिंदी अनुवाद
सिर में दउरा, पीठ में बच्चा
भटका रहा रफ्ता-रफ्ता,
जब से हुई सयानी
पड़ गया पीछे
बड़ा-बड़ा राजघराना,
गाँव-घर की बहू-बेटियों को
बनाया अपना अशियाना,
देख, भूखे भेड़ियों ने
नोच-चोथ
उजाड़ दिया जीवन सारा,
रखे थे छुपा
दिल में कईं-कई सपने
तोड़ दिए सब एक ही झटके में,
माँ-बाबा के अरमानों का
कर दिया खून
कतरा-कतरा,
तन ढ़कने को भी
नहीं मिल रहा अब तो चिथड़ा,
फूटी किस्मत ले
धुकुड़-धुकुड़ अपना जीना,
कभी ईंट भðें में,
कभी रेस्तरॉ में,
कभी वैश्यशाला में,
कभी नचनी घर में,
तो कभी चौक-चौराहे में,
जल रही है,
तप रही है,
लूट रही है,
जीवन के हर मोड़ में,
जल रहा तन-मन
सूखी डालियों सा,
जिन्दगी जैसे जिंदा लाश बन
सिर्फ जिये जा रही,
नारी होने का दर्द झेल रही,
पुरखो की आस को
मगर नहीं नहीं छोड़ रही,
आज नहीं तो कल
बजेगा फिर से अखड़ा में मांदर,
होगा पूरे गाँव में
सुख-चैन और अमन,
सूखी हाड़-मांस में
फिर से लौट आएगी हरियाली,
यही सोच जी रही
( मूल नागपुरी से हिन्दी अनुवाद भी लेखक वीरेन्द्र महतो द्वारा)
