झुनुर-झुनुर बाजे पैजनिया ये राजा चढ़ते अटरिया न...बिहारी लोकगीत
जिला पूर्वी चम्पारण बिहार से कुंदन कुमार एक लोकगीत सुना रहे हैं:
झुनुर-झुनुर बाजे पैजनिया ये राजा चढ़ते अटरिया न-
कहिले सताए राजा मासु के टिका दूजे-
दूजे सताए मोरे बिचवा ये राजा चढ़ते अटरिया न-
झुनुर-झुनुर बाजे पैजनिया ये राजा...
Posted on: Mar 30, 2018. Tags: SONG SUNIL KUMAR VICTIMS REGISTER
गोर लागूं पैयां परूँ, मानी ला कहनावा राजा जी...पूरबी लोक गीत
मुजफ्फरपुर (बिहार) से अशोक शर्मा व्यास एक पूरबी लोक गीत सुना रहे हैं :
गोर लागूं पईयां परूँ, मानी ला कहनावा राजा जी-
मति जावो विदेश, ननदी मारे ला नैना मा-
पांच रुपईया के रे, तोहरी नोकरिया-
दस हम घरही मा देबै राजा जी-
संवरी सुरतिया तोहरी, बस मोर मन मा-
रखबै नयना के समनमा राजा जी...
Posted on: Mar 25, 2018. Tags: SONG SUNIL KUMAR VICTIMS REGISTER
मईया हे गंगा मईया, मांगिला हम वरदान हे गंगा मैया, मांगिला हम वरदान...छटपूजा गीत
कंचन नगर, जिला-मुजफ्फरपुर (बिहार) से सुनील कुमार एक छटपूजा गीत सुना रहे हैं :
मईया हे गंगा मईया-
मांगिला हम वरदान हे गंगा मैया, मांगिला हम वरदान-
जनकपुर नईहर दीह, सासुर अवधपुर समान-
राजा दशरथ ससुर दीह, सासु कौशल्या समान-
पार्वती हमरा बनइह, स्वामी शंकर समान-
राम जईसन बेटा तू दिहा, बेटी सीता सामान-
मइया हे गंगा मइया...
Posted on: Mar 22, 2018. Tags: SONG SUNIL KUMAR VICTIMS REGISTER
बांसुरी में बीन की धुन...
मुड़गीचक, ग्राम-सुमेरा, मुजफ्फरपुर (बिहार) से सुनील कुमार अपने मित्र मो. मुर्तुजा के सांथ हैं वे बांसुरी बनाते है इतना ही नहीं बांसुरी बजाने की भी कला रखते और आज वे सीजीनेट के सभी सुनने वाले संथियों को बांसुरी से बीन की मधुर ध्वनि सुना रहे हैं...
Posted on: Mar 21, 2018. Tags: SONG SUNIL KUMAR VICTIMS REGISTER
लोकगीत का अपना शास्त्र रहा है, लोकसंगीत में अनगढ़ता और खुरदुरापन ही उसका सौंदर्य होता है...
होली को चैती की तरह नहीं गाते, चैती को सोहर की तरह नहीं गाते, सोहर निर्गुण की तरह नहीं गाया जाता, गोड़उ का राग अलग होता है, धोबिया गीत अलग, खिलौना अलग होता है| जोग सहाना का राग अलग, विवाह के गीत में हर विध में धुन-राग बदल जाती है गांव की गीतहारीन महिलाएं का छठ का गीत बिल्कुल अलग राग-धुन रखता है, पराती और पचरा का राग बदल जाता है, सदियों और पीढ़ियों से लोक का अपना शास्त्र रहा है, अलिखित होने के बावजूद यह तेजी से बड़े दायरे में फैलता रहा है और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के मानस में रचता-बसता भी रहा है, यह अनगढ़ रहा है इसलिए लोकसंगीत में अनगढ़ता हो, खुरदुरापन हो तो उसे बहुत परफेक्ट करने की जरूरत नहीं, लोकसंगीत में अनगढ़ता और खुरदुरापन उसका सौंदर्य होता है|




