बेटी चली पराई घर मात-पिता का घर छोड़ी...गीत
ग्राम-तमनार, जिला-रायगढ़ (छात्तीसगढ़) से कन्हैयालाल पडिहारी एक कविता सुना रहे हैं :
बेटी चली पराई घर मात-पिता का घर छोड़ी-
सखी सहेली सबको छोड़ी आई सास ससुर की घर-
अपने दिल पर पत्थर रखकर छोड़ चली पिया का घर-
सास ससुर ननद देवर सबका बनाया अपना घर-
पर लोभी सास ससुर ने उसको कर दिया घर से बेघर-
भेडीयों के बीच में आई लूट लिये जीवन भर की कमाई...
Posted on: Mar 17, 2018. Tags: KANHIYALAL PADIHARI SONG VICTIMS REGISTER
वनांचल स्वर : शीघ्रपतन से बचने और शक्तिवर्धन के लिए घरेलू औषधि
मोतीनगर रायपुर (छत्तीसगढ़) से वैद्य एच.डी. गांधी आज हमें शीघ्रपतन से बचने और शक्तिवर्धन करने के लिए घरेलू ईलाज बता रहे हैं वे बता रहे हैं कि जो व्यक्ति इस समस्या से परेशान हैं वे जंगली सफेद मुसली, जंगली काली मुसली, जंगली सतावर, जंगली कोंच के बीज, जंगली बाल सेमर के कंद और मिश्री सभी को 250-250 ग्राम मिलाकर पीस लें और चूर्ण बनाकर सुरक्षित रख लें, उसके बाद एक-एक चम्मच चूर्ण दूध के सांथ दिन में दो बार सुबह-शाम सेवन करें, सेवन करने से 3 दिन पूर्व हल्का भोजन करे, खाने में तेल मसला, मिर्च, खटाई, गरिष्ठ भोजन का प्रायोग कम करें, नशा का सेवन न करें| अधिक जानकारी के लिए वैद्य एच.डी. गांधी@9111061399.
Posted on: Mar 17, 2018. Tags: HD GANDHI SONG VANANCHAL SWARA VICTIMS REGISTER
माँ सत लगी मैईया माँ सत लगी, माटी के दियाना मा बराथे ज्योति...भक्ति गीत
ग्राम-कड़िया, पोस्ट-केरतासेनपुर, ब्लाक-वाड्रफनगर, जिला-बलरामपुर (छत्तीसगढ़) से राजमती पोया एक भक्ति गीत सुना रही हैं :
माँ सत लगी मैईया माँ सत लगी-
माटी के दियाना मा बराथे ज्योति-
चुनरी लहराबो दाई के, चलो चलो देवी धाम के-
मेला लागे रे सरा सरों में दर्शन न ला तोर पावें-
साधू मुनि देवता धाम में तोरे दुरा मा आवे-
करे है श्रंगार दाई रूप बिंगराए, झंडा लहराबो दाई के...
Posted on: Mar 17, 2018. Tags: RAJMATI POYA SONG VICTIMS REGISTER
छोटी सी मछली, पानी में बिछली...बाल कविता
ग्राम-पहिया, ब्लाक-प्रतापपुर, जिला-सूरजपुर (छत्तीसगढ़) से एक छोटी सी बच्ची अमना एक कविता सुना रही हैं :
छोटी सी मछली, पानी में बिछली-
पापा ने उठाई, मामी ने धोई-
दीदी ने पाकाई, भैया ने खाई-
बड़ा मज़ा आई...
Posted on: Mar 17, 2018. Tags: SONG SUNITA SINGH MARKAM VICTIMS REGISTER
लोकगीत का अपना शास्त्र रहा है, लोकसंगीत में अनगढ़ता और खुरदुरापन ही उसका सौंदर्य होता है...
होली को चैती की तरह नहीं गाते, चैती को सोहर की तरह नहीं गाते, सोहर निर्गुण की तरह नहीं गाया जाता, गोड़उ का राग अलग होता है, धोबिया गीत अलग, खिलौना अलग होता है| जोग सहाना का राग अलग, विवाह के गीत में हर विध में धुन-राग बदल जाती है गांव की गीतहारीन महिलाएं का छठ का गीत बिल्कुल अलग राग-धुन रखता है, पराती और पचरा का राग बदल जाता है, सदियों और पीढ़ियों से लोक का अपना शास्त्र रहा है, अलिखित होने के बावजूद यह तेजी से बड़े दायरे में फैलता रहा है और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के मानस में रचता-बसता भी रहा है, यह अनगढ़ रहा है इसलिए लोकसंगीत में अनगढ़ता हो, खुरदुरापन हो तो उसे बहुत परफेक्ट करने की जरूरत नहीं, लोकसंगीत में अनगढ़ता और खुरदुरापन उसका सौंदर्य होता है|

