कल तक संग्राम था पाकिस्तान से...कविता-

राजनांदगाँव (छत्तीसगढ़) से विरेन्द्र गंधर्व एक कविता सुना रहे हैं:
कल तक संग्राम था पाकिस्तान से-
आज संग्राम है चीन से-
जब सबको पता है-
मिट्टी में मिलने के लिये थोड़ी सी जगह चाहिये-
किसी का रिश्ता नहीं ढेर सी जमीन से-
आज संग्राम है चीन से-
एकता के फूल टूट गये, आज ह्रदय के दाग से... (AR)

Posted on: Jun 20, 2020. Tags: CG POEM RAJNANDGAON SONG VICTIMS REGISTER VIRENDRA GANDHARV

कोरोना कोरोना रे, कोरोना कोरोना रे...कोरोना गीत-

राजनांदगाँव (छत्तीसगढ़) से विरेन्द्र गंधर्व एक कोरोना गीत सुना रहे हैं :
कोरोना कोरोना रे, कोरोना कोरोना रे-
कब तक पड़ेगा इस बोझा को ढोना-
होगा समस्या से दो चार होना-
कब से बेटी सोचे मइके को जाती-
मइके को जाती मै रंग जमाती-
भाभी के बच्चो बच्चो के मन को बहलाती-
कुछ दिन तो घी के मै दीपक जलाती...

Posted on: May 26, 2020. Tags: CG CORONA SONG RAJNANDGAON SONG VICTIMS REGISTER VIRENDRA GANDHARV

मज़दूर है तो संसार है, मज़दूर है तो हम हैं...

राजनांदगांव (छत्तीसगढ़) से वीरेंद्र गंधर्व मजदूर दिवस पर संदेश दे रहे हैं : मज़दूर है तो संसार है | मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, ये कारखाने, ये बड़े बड़े भवन, ये सभी तो मज़दूरों की तो देन है | मज़दूरों का सम्मान करना चाहिए क्योंकि मज़दूर है तो हम हैं | मज़दूरों को हम याद करें उनके काम को सलाम करें | सदा याद रखें : साथी हाथ बढ़ाना, एक अकेला थक जाएगा, मिलकर बोझ उठाना, यह गीत जो साहित्य लुधियानवी लिखकर गए हैं वो मज़दूरों पर पूरी तरह लागू होता है | तो हम सब को मिलकर मज़दूरों का साथ देना है | मज़दूर है तो हम हैं...

Posted on: May 03, 2020. Tags: VIRENDRA GANDHARAV

छोटी उमर थी लम्बी डगर थी...रचना-

राजनांदगाँव (छत्तीसगढ़) से विरेन्द्र गंधर्व एक रचना सुना रहे हैं:
छोटी उमर थी लम्बी डगर थी-
उसकी मंजिल तय हो न पायी-
एक मासूम बच्ची, निकली थी राह में-
अपने गाँव पहुंचने की चाह में-
अपने गंतव्य तक वह पहुंच न पायी-
रास्ते में सांसो को डोरी टूट गयी-
जिंदगी उसके हांथो से छूट गयी...

Posted on: Apr 22, 2020. Tags: CG POEM RAJNANDGAON SONG VICTIMS REGISTER VIRENDRA GANDHARV

अच्छा खा और अच्छा सोंच, त्याग दे शर्म संकोच...कोरोना पर कविता-

जिला-राजनांदगाँव (छत्तीसगढ़) से विरेन्द्र गंधर्व एक कविता सुना रहे हैं:
अच्छा खा और अच्छा सोंच-
त्याग दे शर्म संकोच-
कल तक चेहरा खुल्ला था-
आज पहना ले वस्त्र-
कोरोना से युद्ध करने का-
यही तो है एक शस्त्र-
एक दूजे से दूर रहो मार न दे कहीं चोंच-
अच्छा खा और अच्छा सोंच-
त्याग दे शर्म संकोच...

Posted on: Apr 20, 2020. Tags: CG CORONA POEM RAJNANDGAON SONG VICTIMS REGISTER VIRENDRA GANDHARV

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