वईकी वईकी देदिंता आवन गोटू ते...गोंडी गीत-
बालक छात्रावास, नारायणपुर (छत्तीसगढ़) से सूबराम कोराम एक गोंडी गीत सुना रहे हैं:
रेरे लोयो रेरे ला, राला रे रेला-
वईकी वईकी देदिंता आवन गोटू ते-
निया नवा पोलो याया नाटे गोटू दे-
रेरे लोयो रेरे ला, राला रे रेला...
Posted on: Aug 05, 2019. Tags: BHAN SAHU CG GONDI NARAYANPUR SONG
I Wake up this morning and got into bed...Poem
बालक क्षात्रवास नारायणपुर (छत्तीसगढ़) से ओमप्रकाश एक कविता सुना रहे हैं :
I Wake up this morning and got into bed,
and eat a cup of tee and drinking a slice of bread,
and I went to the bus stop,
and cop the train to school,
and I rode my bicycle,
in the swimming pool.
Posted on: Aug 02, 2019. Tags: BHAN SAHU CG NARAYANPUR POEM SONG VICTIMS REGISTER
सरकार की मदद से स्वसहायता समूह चलाकर अपना जीवन यापन करते हैं...
ग्राम-गढ़बेंगाल, जिला-नारायणपुर (छत्तीसगढ़) से लछंदी हुसेंडी, सुगाय सोरी, निरबती मंडावी बता रही हैं| वे अपने साथियों के साथ स्वसहायता समूह चलाती हैं| जिसमे वे होटल का काम करते हैं| उसी से अपनी जीविका चलाते हैं| समूह में 11 सदस्य हैं| 6 साल वे काम कर रहे हैं| ये काम उन्होंने सरकार की मदद से शुरू किया था| और वे काम आगे बढ़ा रहे हैं| सभी अपने काम से खुश हैं|
Posted on: Jul 07, 2019. Tags: BHOLA BAGHEL CG NARAYANPUR SONG STORY VICTIMS REGISTER
आदिवासी समुदाय के लोग शिकार के लिये धनुष और गुलेल का उपयोग करते हैं...
ग्राम-चिन्नार, जिला-नारायणपुर (छत्तीसगढ़) से भोला बघेल ग्रामवासी बृजेश यादव, नट्टू, दिनेश, कंडी बता रहे हैं| वे वनों में जाकर पछियों का शिकार करते हैं| चूहों का शिकार करते हैं| इसके लिये धनुष और गुलेल का इस्तेमाल करते हैं| आदिवासी ग्रामीण शर्दी, गर्मी, बरसात सभी समय शिकार करते हैं| वे ग्रुप बनाकर शिकार करने जाते हैं|
Posted on: Jul 06, 2019. Tags: BHOLA BAGHEL CG NARAYANPUR SONG STORY VICTIMS REGISTER
बांस की चीजें बनाने की कला लोगों के जीविका का साधन और पहचान है...
ग्राम-देवगांव, जिला-नारायणपुर (छत्तीसगढ़) से भोला बघेल गाँव के निवासी मनीष कुमार बाद्रा से चर्चा कर रहे हैं| मनीष बता रहे हैं| वे बांस की चीजें बनाने का काम करते हैं| सजावट का सामान बनाते हैं| और उसे बेंच कर अपनी आजीविका चलाते हैं| वे 20 वर्ष से ये काम कर रहे हैं| अपनी बनाई चीजों को वे शहरों तक पहुंचाते हैं| जैसे हैदराबाद, मुंबई, बैंगलोर आदि| बांस की चीजें बनाने के लिये कारीगर नये लोगो को सिखाते हैं| इस तरह से ये कला उनके रोजगार का साधन और पहचान है|
