लोकतंत्र की दीवारों से रिसता न्याय...अम्बेडकर जयंती पर कविता
कानपुर (उ.प्र.) से के एम भाई भीमराव अम्बेडकर जयंती के उपलक्ष्य में एक कविता सुना रहे हैं :
नग्न होता न्याय
लोकतंत्र की दीवारों-
से रिसता न्याय-
काले काले बादलों-
बिच घिरता न्याय-
बूढ़ी आंखों से-
ओझल होता न्याय-
कभी मौत और कभी-
ख़्वाब बनता न्याय-
ढलते सूरज बिच-
अंधियारा सा लगता न्याय-
सत्य की आड़ में-
लूट की भेट चढ़ता न्याय-
धर्म की आग में-
जलती लाश बनता न्याय-
संसद की चौखट पे-
शोषण का रूप बनता न्याय-
उम्मीद के कठघरे में-
नग्न होता न्याय-
नग्न होता न्याय...
