ये जिन्दगी एक रेल है... बाल दिवस के अवसर पर एक कविता
कानपुर, उत्तरप्रदेश से के.एम. भाई बाल दिवस के अवसर पर एक कविता प्रस्तुत कर रहे हैं:
हर इंसान एक नादान !
ये जिन्दगी इक रेल है, जहां मौज ही मौज और बैर ही शैर है-
हलकी सी मुस्कान पर सारा जहां ढेर है-
तो फिर किस बात की देर है-
चलो नाच ही नाच और शोर ही शोर है-
ये जिन्दगी इक रेल है, जहां हर घड़ी खेल ही खेल है-
भोली सूरत और आंखें शैतान, फिर भी दिल है नादान-
बस एक ही तो अरमां है, बच्चों सा ही क्यों ना हर एक इंसान नादान हो...
