हल चला के खेतों को मैंने ही सजाया है...मजदूर गीत
रायपुर, छत्तीसगढ़ से मितानिन साथी रजनी एक मजदूर गीत गा रही हैं:
हल चलाके खेतों को मैंने ही सजाया है-
गेंहू-सावां-मक्का के दानों को उगाया है-
चूल्हा भी बनाया है, धान भी पकाया है-
रहूँ क्यों भूखे पेट मैं कि मेरे लिए काम नहीं-
मिट्टी की खुदाई की भट्टी को जलाया है-
ईंटों को पकाया है, बंगला बनाया है-
संसद का हर एक खंभा मैंने ही उठाया है-
सोऊँ क्यों फुटपाथ पे कि मेरे लिए काम नहीं-
धागे को बनाया है, मिलों को चलाया है-
साना-बाना जोड के कपड़ा बनाया है-
सपनों के रंगों से उनको सजाया है-
मुझे क्यों कफन नहीं कि मेरे लिए काम नहीं-
रेल को बनाया है, मैंने सड़कों को बिछाया है-
हवा में उड़ाया है, चंदा से मिलाया है-
नाव को बनाया मैंने, पानी पे चलाया है-
मेरी ना जिंदगी चले कि मेरे लिए काम नहीं-
शाहजहाँ के ताज को मैंने ही बनाया है-
मंदिरों को मस्जिदों को मैंने ही सजाया है-
बांसुरी-सितार को मादर को बजाया है-
कहाँ संगीत मेरे कि मेरे लिए काम नहीं...
