हर शख्स है आगोश में हवस के, गुंजाइश ख़त्म हो गई है शायद बहस के...
जिला-बोकारो, झारखंड से जे.एम. रंगीलाजी एक स्वरचित गज़ल प्रस्तुत कर रहे हैं. रचना समसामयिक सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों के सन्दर्भ में है :
हर शख्स है आगोश में हवस के-
गुंजाइश ख़त्म हो गई है शायद बहस के-
खिदमत के वास्ते सजती थीं महफिलें-
सजाई जाती हैं अब महफिलें अस्मत तहस-नहस के-
दुआ-सलाम था जहां रश्मो-रिवाज-
अब दी जाती है खिताब उसे बेबस के-
वसूल रहे हैं बाजार में अपनी कीमतें-
वो भी शर्म-ओ-हया के बजाय हंस-हंसके-
बेहिसाब नायक हैं भ्रष्टाचार के रंगीला-
इंशा बना जोकर बाजार के सर्कस के...
