मोर पियवा गईल विदेशवा...खोरठा पलायन गीत
जे.एम.रंगीला, जिला-बोकारो,झारखण्ड से साथी वासु विहारी जी जो एक खोरठा भाषा के साहित्यकार हैं से एक पलायन त्रासदी पर गीत प्रस्तुत कर रहे हैं.
झांझर बजिहैं, कोयल बोलय
बोलो है मेजुरवा हो लाल, मोर पियवा गईल विदेशवा
सालो है कलेजवा हो लाल , मोर पियवा गईल विदेशवा
गेलें भइलें महिना चार
चिठियो पठइलें, न कौनो खबर
राखब कइसे धीरजा हो लाल
मोर पियवा गईल......
खर्चो घटले, जाकिट पटले
तनी चूरा मा खैले तेलो न बचले
कहियो कि दिन के हवलवा
मोर पियवा गईल...
सुना-सुना सखिया, ऐसा कहिया
ऐसा कहिया, पिया निरमोहिया
एकै कहिया सगुनवा हो लाल
मोर पियवा गईल...
