मंजिल जहाँ वहीं रुकना है, सब कोई दिल में ठान लो...संघर्ष गीत
निकले हैं हम खुली सड़क पर, हक लेना है जान लो
मंजिल जहाँ वहीं रुकना है, सब कोई दिल में ठान लो
क्यों गरीब है सोचा भाई, इसमें भी आटा गीला है
गाँव-गरीब को लील रहे हैं, पूंजीवाद की लीला है
सारे जहाँ में एका करके, खोया हुआ सम्मान लो
मंजिल जहाँ वहीं रुकना है..........
रक्षक बन बैठे हैं भक्षक, चोरों की रखवाली है
जल-ज़मीन और जंगल लूटे, संस्कृति ये पाताली है
सारे जगत में ग़दर उठेगी, दुनिया का इतिहास लो
मंजिल जहाँ वहीं रुकना है...
पेट भरन को दाना चहिए, ये अभियान हमारा है
श्रम-पूंजी के द्वंद्व में भइया, तन-मन लुटा हमारा है
गांधी-बिनोवा-जयप्रकाश की राह में सब कोई जान लो
मंजिल जहाँ वहीं रुकना है, सब कोई दिल में ठान लो
