ठगा ठगी का खेल चला है जन जन लुटता जाता है...
ठगा ठगी का खेल चला है जन जन लुटता जाता है
दे देकर धोखा ये कैसे हम को छलता जाता है
उपभोक्ता अब तुम जाग उठो नव प्रभात कि बेला है ,
उपभोक्ता तुम अब जाग उठो ,अब अपनी पहचान बनाना है
धोखा दे या करे मिलावट कम तौले या करे मिलावट
सोना चाँदी , मिर्च मशाला,कपडा लत्ता तक ठग डाला ,
चावल में जब कंकड़ डाला ,आते में जब भाटा मिल जाता ,
पलती मछली जग दूधो में खोआ में आलू मिल जाता
नाम किसी का दाम किसी का फिर भी बिकता जाता है ,
चमक दमक से आँखे चुंधियाई अँध्यारो में गिरता है
जाग जाग तू रे उपभोक्ता देख कहाँ तू जाता है
