मुझे किसी चिंगारी की सोंधी सी खुशबू आ रही है...
इंकलाब ऐसे ही नहीं हो जाते हैं
इंकलाब भीख में नहीं मिल जाते हैं
अन्याय की चरम सीमा होती है
इंसाफ का गला घोंटा जाता है
आवाज़ पर ताले लगाए जाते हैं
तब बदलाव के अंकुर लहलहाते हैं
कैदखाने में इंसानियत जब चीखती है
और दीवारों के पत्थरों से टकराती है
तब जाकर बदलाव की चिंगारी पैदा होती है
इस चिंगारी की आग न अंग्रेज़ बुझा पाए थे
न ही पूंजीपतियों के दमकल बुझा पाएंगे
ये सारे के सारे भ्रष्टाचार के भीमकाय दानव
ताश के पत्तों की तरह बिखर जाएंगे
जंगलों की लकडियां किसी की कुर्सी बनने से इंकार कर देगी
ज़मीन के लुटेरे दो गज़ ज़मीन के लिए भी तरसेंगे
मासूम आंखों के आंसू आग बनकर बरसेंगे
अन्याय अपनी चरम सीमा को पार कर रहा है
हर सोए हुए ज्वालामुखी पर वार कर रहा है
मुझे किसी चिंगारी की सोंधी सी खुशबू आ रही है
सुनो कि धरती माता इंकलाब को पुकार रही है
अमीर रिज़वी
