नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन!
आमों पर खूब बौर आए
भंवरों की टोली बौराए
बगिया की अमराई में फिर
कोकिल पंचम स्वर में गाए।
फिर उठें गंध के गुब्बारे
फिर महके अपना चन्दन वन
नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन!
गौरैया बिना डरे आए
घर में घोंसला बना जाए
छत की मुंडेर पर बैठ काग
कह कंाव-कांव फिर उड़ जाए
मन में मिसिरी घुलती जाए
सबके आंगन हों सुखद सगुन।
नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन!
बच्चों से छिने नहीं बचपन
वृद्धों का ऊबे कभी न मन
हो साथ जोश के होश सदा
मर्यादित बनी रहे फैशन
जिस्मों की यूं न नुमाइश हो
बदरंग हो जाए घर आंगन।
नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन!
घाटी में फिर से फूल खिलें
फिर स्र्के शिकारे तैर चलें
बह उठे प्रेम की मंदाकिनि
हिम-शिखर हिमालय से पिघलें।
सोणी मचले, महिवाल चले
रांझे की हीर करे नर्तन
नव वर्ष तुम्हारा अभिनन्दन !
जगदीश व्योम
