पढ़ मत कहे ससि से उठकर तुम ही ऊँचे बन जाओ
पढ़ मत कहे ससि से उठकर तुम ही ऊँचे बन जाओ
सागर कहता हाय लहराकर मन में गहराई लाओ
समझ रहे हो क्या कहती है उठ उठ ऊँची तरन तरंग
भर लो अपने मन में मीठी मीठी मधुर उमंग
पृथ्वी कहती गैर न छोड़ो कितना भी हो कोलाहल
नभ कहता है इतना फैलो जैसे फैले ज्ञान प्रकाश
ईश्वर अल्ला नहीं जुदा है वही खुदा फिर क्यों करते लोग लड़ाई
बैर करके खोदी खाई गली गली गॉव तकरार मचाया
प्रेम प्यार को नहीं बचाया जब एक आँगन की सभी संतान
पढ़ लिखकर ज्ञानी ने फिर क्यों झगड़ा भड़काएं
भाई भाई को लड़वाएं अए हाय बात बहुत दुःखदाई
फिर क्यों करते हम ऐंसा भाई
इसका क्या अंजाम मिलेगा जग में पीछे पड जाएगा
