इंसान और जीवन...एक कविता
आलीशान इमारतो और महलो के बीच पलता इंसान
महँगी और फर्राटेदार कारो के पीछे भागता इंसान
सुविधा और सोहरत के नाम पर ऐठता इंसान
दो जून की रोटी की आस में चाय की दुकानों पर सड़ता बचपन रुपी इंसान
भीख की आस में चौराहे पर चवन्नी की तरह नाचता इंसान
पेट की तड़प के वास्ते कूढ़े के ढेर में जीवन ढूँढता इंसान
अपने तन ढकने के वास्ते दूसरो का मल साफ़ करता इंसान
भूख मिटाने की आस में झूठे बर्तन साफ़ करता इंसान
इलाज की आस में अस्पतालों में दम तोड़ता इंसान
कुछ कमाने की आस में रिक्से पर बोझ ढोहता इंसान
कुछ पाने की आस में चोरी-डकैती करता इंसान
हवस मिटने की आस में मासूमो की इज्जत लूटता इंसान
अपना हक़ पाने की आस में अधिकारों की लड़ाई लड़ता इंसान
संबंधो की आस में अपमान और अत्याचार सहता इंसान
मोक्ष की आस में सन्यासी के रूप में जीवन जीता इंसान
नए जीवन की आस में चिता रुपी शय्या में सोता इंसान
हाय ये इंसान, हाय ये इंसान…
कैसा है ये इंसान कैसा है ये इंसान…
