लेखन भी एक बला है !
हमारे वो कुछ शब्द उन्हें इतने नागवार गुजरे
कि उन्हें शब्दों से ही नफरत होने लगी
कहते है अक्षरों से शब्द बनते है और शब्दों से विचार
तो फिर विचारो को शब्दों की शक्ल देना गुनाह क्यों
हमारा इरादा तो सिर्फ बयां ए हकीकत था
पर न जाने क्यों उन्हें यह अफसाना पसंद न था
यह सच है हमारे खून का सम्बन्ध किसी महीम से नहीं
और हमारे पास किसी विलायती तालीम का तजुर्बा भी नहीं
पर हम भी चार पोथी का इल्म रखते है
शब्द और अक्षर के बीच का अर्थ समक्षते है
इस लोकतंत्र ने कल हमसे हमारा सपना छीना था
और आज यह हमसे हमारे शब्द भी छीन रहा है
कभी फुर्सत मिले तो अपने अक्श से बाहर भी देखिएगा
इन छोटे छोटे अक्षरों और शब्दों का भी अपना एक सम्मान होता है
