आओ एक ऐसे समाज की कल्पना करे...
जहाँ न कोई दर्द हो न कोई घुटन
जहाँ न कोई उदास हो और न कोई दुखी
जहाँ न कोई बेबस हो और न कोई बेचारा
जहाँ न कोई दुखी हो और न कोई परेसान
जहाँ न कोई हिंसा हो और न कोई शोषण
जहाँ न कोई सहमा हो न कोई डरा
जहाँ न कोई बंदिश हो और न कोई रोक
जहाँ न कोई सरहदे हो और न कोई सीमा
जहाँ न कोई दरवाजा हो और न कोई दीवार
जहाँ न कोई बंटवारा हो और न कोई परिवार बिखरे
जहाँ न कोई पिंजरा और न कोई जेल
जहां न कोई गरीब हो न कोई अमीर
जहाँ न कोई बीमार हो और न कोई भूखा
जहाँ न कोई ऊचां हो और न कोई नीचा
जहाँ न कोई असमानता हो और न कोई गैर बराबरी
जहाँ न कोई धर्म हो और न कोई जाति
जहाँ न कोई भेद भाव हो और न कोई मन मुटाव
जहाँ न कोई अपराध हो न कोई जुर्म
जहाँ न कोई पराया हो और न कोई दुश्मन
जहाँ न कोई चोर हो और न कोई अपराधी
जहाँ न कोई किसी को सताए और न कोई किसी को रुलाये
जहाँ न कोई किसी से घ्रणा करे न कोई किसी से नफरत
जहाँ सिर्फ प्रेम और ख़ुशी का माहौल हो
जहाँ सिर्फ इंसानियत और मानवता हो
जहाँ हम भी खुश रहे और तुमभी खुश रहो
आओ एक ऐसे समाज की कल्पना करे
जहाँ सब खुश रहे ...
खुश रहे, खुश रहे, खुश रहे ...
