तू बोलेगी, मूँह खोलेगी, तब ही तो जमाना बदलेगा...
दरिया की कसम, मौजों की कसम।
ये ताना-बाना बदलेगा…2
तू खुद को बदले तो, खुद को बदले तू।
तब ही तो जमाना बदलेगा...2
तू चुप रह कर जो सहती रही
तो क्या ये जमाना बदला है
तू बोलेगी, मूँह खोलेगी
तब ही तो जमाना बदलेगा
दस्तूर पुराने सदियों के
ये आये, कहाँ से क्या आये
कुछ तो सोचो, कुछ तो समझो
ये क्या तुमने है अपनाये
ये पर्दा तुम्हारा कैसा है
क्या ये मजहब का ही का है।
कैसा मजहब? किसका पर्दा?
ये सब मर्दो का किस्सा है।
आवाज़ उठाना, कदम मिला
रफ्तार जरा कुछ और बढ़ा...2
