मैं दामोदर गम का मारा...
मैं दामोदर गम का मारा
मेरे रोम रोम दुश्मन बसा
मेरी हालत देख जग हँसा
दिल में मेरे ज्वार फूटा
आँखों में अंसुअन की धारा
जब ऊंचे बांधों में बंधा मैं
नाली की तरह फिर बना मैं
राख रसायनों में घुला जब
ज़हर बना गया अमृत सारा
मेरे पग पग में काला सोना
हरियाली था कोना कोना
हर पेड़ प्राणी मेरे साये जीते
सबको जिताया खुद को हारा
जीवन था खुशियों से भरा
मेरे माता पिता अम्बर धरा
सोचा था बरसो जीऊंगा
फूटा अब ख़्वाबों का तारा
हे मानव तुझपे धिक्कार
थोड़ी सुन मेरी चीत्कार
मिट चला इतिहास मेरा
बचाओ मुझे लगाकर नारा
नईम एजाज़
