ओ दीवानों धन-दौलत के कुछ तो शर्म करो : बाल-श्रम पर एक कविता
ओ दीवानों धन-दौलत के कुछ तो शर्म करो
ओ बचपन के हत्यारों तुम इंसानी कर्म करो
माना मजबूरी है उनकी, जो मजदूरी करने जाते है
केवल दो रोटी की खातिर, ये बचपन दाँव लगाते है
नन्हे-मुन्ने इन मासूमों की, खुशियॉ मत हरण करो
ओ दीवानों धन-दौलत के कुछ तो शर्म करो
जिनकी मेहनत के बल पर ही, तुम दौलतमन्द कहलाते हो
उस कृशकाया का लहू चूस कर, अपना परचम फहराते हो
गर उगला लहू तो, बच ना सकोगे
छोड़ो मत, गरम करो
ओ दीवानों धन-दौलत के कुछ तो शर्म करो
कोरे कागज पर लिखो रुबाई, शायर बन पूजे जाओगे
पन्ना धाय की सुनी कहानी, इतिहास वही दोहराओगे
इक दुखिया का बनो सहारा, सौ जन्मों का धर्म करो
काशी-काबा जाने से पहले, दिल की कालिख साफ करो
भरे पेट को भरने वालों, मोहताजों संग इंसाफ करो
नेक-नीयत को बुतखाना, दिल को हरम करो
ओ दीवानों धन-दौलत के कुछ तो शर्म करो
ओ बचपन के हत्यारों तुम इंसानी कर्म करो
