ज़ुल्म के इन परबतों को हम हटाना चाहते...
क्या बताऊं रात बीती है हम ही क्यों जागते
ज़ुल्म के इन परबतों को हम हटाना चाहते...
आज कोठों पर हुई नीलाम उनकी ज़िन्दगी
हम उन्ही के हाथ से राखी बंधाना चाह्ते
उन शहीदों की चिताओं की राख लेकर हाथ में
देश को फिर से यहां बागी बनाना चाह्ते
