मन समर्पित तन समर्पित और यह जीवन समर्पित...कविता-
सीजीनेट के साथी ओमकार मरकाम एक कविता सुना रहे हैं :
मन समर्पित तन समर्पित-
मन समर्पित तन समर्पित और यह जीवन समर्पित-
चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूँ-
माँ तुम्हारा ऋण बहुत है मैं अकिंचन-
किन्तु इतना कर रहा फिर भी निवेदन-
थाल में लाऊँ सजाकर भाल जब-
स्वीकार कर लेना दयाकर यह समर्पण-
गान अर्पित प्राण अर्पित रक्त का कण-कण समर्पित...
