नभ किरण का रथ सजा है...कविता
मुजफ्फरपुर (बिहार) से रवि वर्मा हरिवंशराय बच्चन की एक कविता सुना रहे हैं:
नव-किरण का रथ सजा है-
कलि-कुसुम से पथ सजा है-
बादलों-से अनुचरों ने स्वर्ण की पोशाक धारी-
विहग, बंदी और चारण-
गा रही है कीर्ति-गायन-
छोड़कर मैदान भागी-
तारकों की फ़ौज सारी-
चाहता, उछलूँ विजय कह-
पर ठिठकता देखकर यह-
रात का राजा खड़ा है-
राह में बनकर भिखारी-
आ रही रवि की सवारी...
