बसंत में सुषमा, श्रंगार, सुमन, सौरभ से सुरभित हो उठते हैं...बसंत पर कविता
बाल साहित्यकार डा पी एस पुष्प तमनार, जिला रायगड़ छत्तीसगढ़ से एक कविता सुना रहे हैं:
बसंत में सुषमा, श्रंगार, सुमन,सौरभ से सुरभित हो उठते है-
कभी धनवान बुढे,जवान, सभी अलमस्त झूम हो उठते है – इस अल्हर से मौसम में गेहू भी हरिआये है-
वन,उपवन की सुन्दर काया,मन सबके अब भाए है-
बसंत राज की अगवानी में,कमल,कामिनी बिहस पड़ते है-
कभी धनवान बूढ़े,जवान, सभी अलमस्त झूम हो उठते है – खेत,खलियान मैदान अब,मस्ती में सब झूम रहे है-
प्यारे,प्यारे पुष्प निराले,सोलह श्रंगार धरती कर रहे है-
बसंत,बयार के गुंजन में,मदहोश सा पुरवाई भी लगती है-
कभी धनवान बूढ़े,जवान, सभी अलमस्त झूम हो उठते है – बसंत में सुषमा,श्रंगार,सुमन,सौरभ से सुरभित हो उठते है...
