जिसका नाम है सुनती हो: एक ग्रामीण महिला की कहानी
एक ग्रामीण महिला की कहानी
जिसका नाम है सुनती हो
पांच बच्चों की माँ है सुनती हो
सुनती हो अपने बच्चों को पालती है
सुनती हो घर का सारा काम काज करती है
सुनती हो खेत में काम करने जाती है
सुनती हो शाम को गाय भैंसों की भी देखभाल करती है
एक बार फिर सुनती हो घर के सभी सदस्यों के लिए खाना पकाती
इसके बाद भी सुनती हो अपने पति के हाथ मार खाती है
इतना ही नहीं अपमान और अत्याचार की ना खत्म होने वाली पीड़ा झेलने के बाद
अगले दिन सुबह फिर से अपने घर के देखभाल में लग जाती है
ये कैसा साहस और कैसा हौसला है
क्यों एक महिला का ह्रदय इतना सहनशील और कोमल होता है
जो अत्याचार की मार सहने के बाद भी कठोर नहीं बनता
इसका दिल हमेशा करुणा और ममता से भरा रहता है
जो रोती है तो आँखों से आंसू नहीं ममता रूपी मोती गिरते हैं
दिल में दर्द होने पर भी चहरे पर मुस्कान लिए रहती है
अपनी इच्छाओं और अरमानों को मारते हुए
सभी पर अपनी करुणा और ममता लुटाती रहती है
ऐसी करुणामयी महिला को बार बार नमन
के एम यादव
