न रोजी है न रोटी हैं, न रोजी है न रोटी है...कविता-
कैलाश सिंह पोया सूरजपुर छत्तीसगढ़ से एक कविता सुना रहे हैं:
न रोजी है न रोटी हैं, न रोजी है न रोटी है-
न तन पे लंगोटी हैं ,न तन पे लंगोटी है-
पर वहां मंदिर मस्जिद को रोते हैं-
पर वहां मंदिर मस्जिद को रोते हैं-
पीठ पेट से लग आई ,पीठ पेट से लग आई...
