हाय हाय हमरे ई दुरबा पर ठूठ रे बिरिछिया...मुहर्रम गीत
विजयादशमी और मुहर्रम का कैसा अदभुत संयोग । एक शक्ति की अराधना का महापर्व ।दानवत्व पर देवत्व की विजय का प्रतीक और दूसरा अन्याय और अत्याचार के खिँलाफ लडते हुए दो महापुरुषों की शहादत की याद दिँलाने वाला । दोनो का उद्देश्य मगर एक । पर कहां हुई दानवत्व पर देवत्व की विजय,कहां हुआ अत्याचारियों का अंत ? आईए मुहर्रम के अवसर पर इन्ही कुछ सवालों से रूबरू कराता यह मर्सिया गायें और सोचें कि इस स्थिति से उबरने मे हमारा कोई फर्ज नही बनता क्या ?
हाय हाय हमरे ई दुरबा पर ठूठ रे बिरिछिया-
नाहि फूल फल के आसे जी-
ए पर वास करे भूत रे परेतबा-
हड्डिया चबाए खाए मासे जी-
हाय हाय हमरा न बंगला न महल अटरिया उस्सरे-खासर चासे बासे जी-
परती—परतबा न छोडले मुद्द ईया-
ग ईया बिसूके बिना घासे जी-
हाय हाय बडका के घडबा समुन्दर पनिया-
छोटका जे मरे हय पियासे जी-
नाहि मिले रोजी-रोजगार नोकरिया-
घरे घर लोग स निराशे जी-
हाय हाय चानी काटे नेतबा बनिक ठिकदरबा-
ग्रहण लागल हय विकासे जी-
काटेला कुल्हरबा ई गछिआ बिरिछिया-
बेंट लागल जब बांसे जी-
हाय हाय चुप देख कोईली सुगनमा मयनमा-
उलुआ स बनल देख व्यासे जी-
दु:शासन द्रौपदी के रोजे लंगटियाबे-
शकुनी करे अट्टहासे जी...
