पीली साड़ी, हाथ मेंहदी, बाजूबंद में आई थी...शहीद कविता
बिहार (गया) के बेटे शहीद सुनील कुमार विद्यार्थी की “वीरांगना” पत्नी पर मालीघाट मुजफ्फरपुर बिहार से सुनील कुमार एक कविता सुना रहे हैं:
पीली साड़ी, हाथ मेंहदी, बाजूबंद में आई थी-
वो भी क्या दिन थे ,सुहाग के आंगन में तरुणाई थी-
बड़ा स्वप्न था तेरे कंधे पर चढ पहुचूंगीं मैं श्मशान-
उठा लिया अपने कंधे पर, पर घाव नही तेरा वलिदान – मैं लाचार नहीं, नारी हूँ, भारत माँ की पोषिता-
मैं रणचंडी लक्ष्मीबाई, सावित्री सी योषिता-
ये मत सोचो तेरे प्यार के वो दिन अब मैं भूल गयी-
तेरे पुण्य उत्सर्ग के कारण अवसादों में झूल गई-
मेरी डोली, तेरी अर्थी के अंतर, देखो प्रतिकूल हैं-
मैं आँचल से लिपटी निकली ,तेरे स्यंदन पर फूल हैं-
मै आई थी लिपटी-चुपड़ी, बस आंगन एक सजाने को-
तेरा स्यंदन आज ,गगन को, बस जयघोष सुनाने को-
ये वलिदानी अर्थी जैसे सजी-धजी मेरी डोली-
आज भी देखो !मैने पहनी है साड़ी फिर वो पीली-
भले प्राण से मुक्त हुएं तुम प्रियतम मुझ से दूर कहाँ है-
ग़म मत करना ,रक्षित है बसुधा, तेरी बेवा का पहरा है...
