तीर धनुष बांसुरी व फूलो के श्रृंगार में...आदिवासी कविता
संताल परगना की पहली आदिवासी कवियत्री आशा सुषमा किसकू की कविता आदिवासियों का संसार को सुना रहे हैं सुनील कुमार:
तीर धनुष बांसुरी व फूलो के श्रृंगार में-
रहते मस्त आदिवासी अपने ही संसार में-
श्याम रंग नंगे बदन ,प्रकृति के अंक में-
राजाओ में क्या मिलेगा,छिपा जो इस रंक में-
कीमत इसकी कौन आंके दुनिया के बाजार में-
रहते मस्त आदिवासी अपने ही...
हंसते हंसते इसको चट्टानो से लड़ना आता हैं-
हर विपदा हर बाधा से शेरों से भिड़ना आता हैं-
इतनी तेजी इसके तन में न किसी तलवार में-
रहते मस्त आदिवासी अपने ही...
वृक्षो पत्तो से अच्छादित मिट्टी के मकान हैं-
घेरा जैसे खुला आंगन जैसे खलिहान हैं-
प्रकृति कला नाच दिखाती घर के दिवार में-
रहते मस्त आदिवासी अपने ही...
छल कपट धोखेबाज़ी से ये कोसो दूर हैं-
सीधेपन के कारण सब दिन लुटने को मजबूर हैं-
फिर भी नहीं मिलता रुखापन कभी इसके व्यवहार में-
रहते मस्त आदिवासी अपने ही...
शिक्षा- दिक्षा के अभाव में ,लगी न आधुनिक हवा-
भोगते नित दिन रोग भयंकर इनको नहीं दवा-
बर्तन जेवर रखते गिरवी ,रोगों के उपचार में-
रहते मस्त आदिवासी अपने ही संसार में...
