अब देश को बेटियां कितनी खटकती है...कविता
ऋषभ मिश्र ग्राम-ओझापुरवा, जिला-रीवा, मध्यप्रदेश से एक कविता सुना रहे हैं:
दृश्य ऐसा देखकर सांसे लटकती है-
फल नही अब पेड़ पर लाशें लटकती हैं-
वासना की ये सुनामी चीखकर कहती है-
सभ्यताएं रस्ते कैसे भटकती है-
मान-मर्यादा सुरक्षा प्यार सब गायब-
अब देश को बेटियां कितनी खटकती है-
चीख आंसू, जुल्म शोषण जातियां,ब्याह – आज आँगन में मटकती हैं-
आज तक पिघला नहीं है-
दिल दुआओं का चाहते-
चाहते कितना चरण सिर पटकती है-
सिर्फ आधी रात को माँ ही बताएगी-
बाप की ये हड्डियाँ कैसे चटकती हैं-
बादलों की आँख में जब शर्म दिखती है-
तब कहीं इस खेत में खुशियाँ फटकती हैं-
दौलत से सांस दंदे पेट भरती है-
गोलियां सल्फास की-
बहुएं गटकती हैं-
वक्त बदला है अभी तुम देखते जाओ-
दूर घड़ियाँ हाथ से क्या-क्या झटकती हैं...
