मन ह गदगद हो जाथे, जब जुन्ना संगी के सुरता आथे...छत्तीसगढ़ी कविता

बिलासपुर, छत्तीसगढ़ से संगीता तिवारी छत्तीसगढ़ी भाषा में एक कविता प्रस्तुत कर रही हैं. कविता बचपन-मित्रता और जिन्दगी-बदलाव व जिम्मेदारियों के संदर्भ में है:
मन ह गदगद हो जाथे, जब जुन्ना संगी के सुरता आथे-
मन मयूरा नाचे लगथे, अउ भौंरा हव गुनगुनाथे-
संगी लग मिलन के आश ह जाग जाथे-
अउ रहि-रहिके के मन हव गुदगुदाथे-
कइसे रहन संगे-संग, पढ़न संगे खान-
जावन गेती संगे-संग, मन के गोठ गोठियान
कभू झगड़न कभू लड़न कभू रिशा जान-
कभू-कभू सुरे-सुर मा बोलन ना गोठियान-
बाद मा मनाये खातिर देख के मुचमुचान-
हाथ ला धरे-धरे खावन अब्बड़ कीरिया-
तोर बिना रहना पड़िहीं वो ही अब्बड़ कीरिया-
आज जब बाड़ गयेन हो गयेन अब्बड़ बुढ़िया-
अपन-अपन जिनगी मा रमे हवन बढ़िया-
लइका-बच्चा जीवनसाथी जिम्मेदारी के सीढ़िया-
जेमा चढ़के संगे-संग पार करबो तरिया-
अउ संगी के सुरता ला गुनगुनात-
गुनगुनात गात रही वो ददरिया...

Posted on: Apr 09, 2016. Tags: Sangeeta Tiwari

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