होता है अहम जिसके अंदर...एक कविता

होता है अहम जिसके अंदर

लगता है छोटा उसे समंदर
हिमालय को कहते हैं ये ठिगना
जैसे कि हो ये इनका घुटना
समझते हैं ये खुद को ये इतना ऊंचा
आत्मा खुद झुककर हो जाता है नीचा
दिखता है चांद इन्हें सरसों का दाना
दो आंख वाला लगता है इन्हें काना
बहाते हैं जब अपने ज्ञान की ये गंगा
बडे से बडा ज्ञानी समझता खुद को नंगा
बातों में इनकी होते हैं बडे बडे बोल
बनी न वो तराजू जो सके इन्हें तौल
खाते भले हों ये दाल बाटी चूरमा
खोजे में भी न मिलता इनका कोई सूरमा
इनकी हर अदा होती है औरों से जुदा
चलते हैं जब ये तो नज़र आते हैं खुदा
आंखे इनकी देती इस बात की गवाही
मिले अगर मौका तो कर सकते ये तबाही

रजनीश श्रीवास्तव

Posted on: Nov 17, 2010. Tags: Rajneesh Srivastava

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