पहुँच गए हैं छोटे छोटे बच्चे-बच्चियाँ, खाली-खाली हाथ, खाली-खाली पाँव...

पहुँच गए हैं छोटे छोटे बच्चे-बच्चियाँ,
खाली-खाली हाथ, खाली-खाली पाँव
यहाँ नदी-किनारे, और बैठ गए हैं पाँत में
कि हो भोर, बढे गोड, भटक रही, भटक रही
नदी के पानी में

इनकी नन्हीं-नन्हीं अँगुलियाँ, थर-थर काँप रहीं हैं
मुँह से निकाल रही है भाप, सुडसुडा रही है नाक
हाथ-पाँव कनकनी से, ठिठुर-सिकुड गए हैं
ऐसी ठंड से बचने को, बस लुंगी-लुगा की बाँधे हैं गाती
पर देखिए, आकर यहाँ, कि सूर्य-उगने का अभी बेर बाकी
और यहाँ पहुँच इनकी आँखों में, उग आई है लालिमा
फूटने को हैं किरणें

अब जब हो गए है कुछ अँजोर, पानी में उतर चह-चह चहकने लगे हैं
और भर गए हैं मन-पोर पोर ऐसे हुलास से,
कि वे खो बैठे हैं क्षण-भर को अपना धैर्य
कमर-भर पानी में धुस गए हैं नंग-धडंग
और एक हाथ से पकडे फांड में, छान-छान एक हाथ से
रख रहे हैं, और गुदगुदी से, खिल खिलखिला रहे हैं
और जिस फूल को, कभी किसी ने देखा नहीं
न ही सुना कभी, उसकी तरह, महक रहे हैं

कि आ ! हा !आज जो इनके घरों से उठेगा धुआँ
होगा वह तो, वैसा ही, जैसा हर दिन, पर आज जो मिलेगा कौर-कौर स्वाद !
रोआँ-रोआँ गाएगा प्रीत-गीत रे वसंत ! अगर बबुओं ने न छिना, बच निकले
छुप-छुपाए, चहकते -महकते ये बच्चे, गाँव बाहर अपने टोला में

ओह ! कहीं डूबें न !सिहर-सिहर जा रहा देख !
पर वो तो छान रहे हैं, कभी कमर, कभी छाती-भर पानी में
चले जा रहे उन्हें छानते दूर तलक, ठंड में जो उतरा जाती हैं
झिंगवा, झिंगवा रे भाई !

कुमार वीरेंद्र—

Posted on: Jul 10, 2013. Tags: Kumar Virendra

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