सन्तान कहलाने के लायक नहीं, फिर भी संतान कहलाते हैं...कविता

ग्राम-तमनार, जिला-रायगढ़ (छत्तीसगढ़) से कन्हैयालाल पडियारी एक कविता सुना रहे है:
सन्तान कहलाने के लायक नहीं, फिर भी संतान कहलाते हैं-
अपने ही धुन में मस्त हो मस्ती करने चले जाते हैं-
मना करो जिन राहो में जाने को, उसी राह में चले जाते हैं-
सोचते हैं मन में क्या क्यों मना किया गया, चलो थोड़ा देख कर आते हैं-
वहां देखने क्या जाते है, वहां की भव्यता देख वहीँ रह जाते हैं-
अपने धुन में उसे पता नही चलता कि ये भयानक दलदल है-
फंसते-फंसते इतना फंस जाता है कि फिर वह निकल नहीं पाता है-
तब याद आता है उसे कि माता पिता ने क्यों रोका था...

Posted on: Sep 10, 2018. Tags: CG KANHAILAL PADHIYARI POEM RAIGARH

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