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ये उमा काल छीदा...कर्मा गीत

ग्राम-देवरी, जिला-सूरजपुर (छत्तीसगढ़) से कैलाश पोया एक कर्मा गीत सुना रहे हैं :
ये उमा काल छीदा-
कहाँ यहाँ पांच वइदा रे – हाँ-हाँ तो ना जो कहाँ जुदा आके-
चेला काहे रेला मांग रे गांजा – सूखी में न धापे न खेत जुआ के-
दरिया में पांच बैला रे-
खेला खेला खेला-
ये उमा काल छीदा...

Posted on: Sep 07, 2017. Tags: KAILASH POYA

आज काल मानुष तन फम्फा जिन्दगी लेकर आये...कविता

ग्राम-देवरी, जिला- सूरजपुर (छत्तीसगढ़) से कैलाश पोया एक कविता सुना रहे हैं :
आज काल मनुष तन फम्फा जिन्दगी लेकर आये-
कुकर खाते-खाते नासा पानी में अपन जीवन ला गवाए-
ये नइ सोचे कि माता पिता केतना मेहनत करे-
आज अपन विपत दुःख ला ये मन नइ डरे-
जिन्दगी जिए बर नइ चाहे-
मरे बर चाहथे – डर लाज भये ये मन-
जीवन ला देहे बर बात करथे...

Posted on: Sep 03, 2017. Tags: KAILASH POYA

जाग जा आदिवासी भाई रे..कर्मा गीत

ग्राम-देवरी जिला-सूरजपुर (छत्तीसगढ़) से कैलाश सिंह पोया कर्मा गीत सुना रहे है:
जाग जा आदिवासी भाई रे-
मिलजुल के जिन्दगी ला बिताई-
जुट के खाना दाना, जुट के रहना-
जुट के सुमति बनाई रे-
व कम-रकम सरकार योजना ला बनाई-
वही योजना अधिकारी मन ला दबाई-
घर के पीके दारु नशा करत है लड़ाई-
जाग जा आदिवासी भाई रे... एक

Posted on: Sep 02, 2017. Tags: Kailash Poya

यह बात समझ में आई नही, और मम्मी ने समझाई नही...

ग्राम-देवरी, जिला-सूरजपुर (छत्तीसगढ़) से कैलाश सिंह पोया कविता सुना रहे है:
यह बात समझ में आई नही-
और मम्मी ने समझाई नही-
मै कैसे मीठी बात करू, अब मीठी चीजें खाएं नही-
आपा भी पकाती है हलवा, वह आखिर क्यों हलवाई नही-
भाया की मंगनी हो गई कल, क्यों कल ही दुल्हन मंगवाई नही-
यह बात समझ में आई नही...

Posted on: Aug 31, 2017. Tags: KAILASH POYA

एक बच्ची स्कूल नहीं जाती, बकरी चराती है, वह लकडियां बटोरकर घर लाती है...

ग्राम-देवरी, जिला-सूरजपुर (छत्तीसगढ़) से कैलाश सिंह पोया श्याम बहादुर नम्र की एक कविता सुना रहे है:
एक बच्ची स्कूल नहीं जाती, बकरी चराती है-
वह लकडियां बटोरकर घर लाती है-
फिर मां के साथ भात पकाती है-
एक बच्ची किताब का बोझ लादे स्कूल जाती है-
शाम को थकी मांदी घर आती है-
वह स्कूल से मिला होमवर्क मां-बाप से करवाती है-
बोझ किताब का हो या लकडी का-
बच्चियां ढोती हैं-
लेकिन लकडी से चूल्हा जलेगा-
तब पेट भरेगा-
लकडी लाने वाली बच्ची यह जानती है-
वह लकडी की उपयोगिता पहचानती है-
किताब की बातें कब किस काम आती हैं-
स्कूल जाने वाली बच्ची-
बिना समझे रट जाती है-लकडी बटोरना,
बकरी चराना और मां के साथ भात पकाना-
जो सचमुच घरेलू काम हैं-
होमवर्क नहीं कहे जाते-
लेकिन स्कूलों से मिले पाठों के अभ्यास-
भले ही घरेलू काम न हों-
होमवर्क कहलाते हैं-
कब होगा जब किताबें-
सचमुच होमवर्क से जुडेंगी-
और लकडी बटोरने वाली बच्चियां भी-
ऐसी किताबें पढेंगी...

Posted on: Aug 30, 2017. Tags: KAILASH POYA

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