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अपना गावं भी अब तो नहीं लगता अपना...झारखंड से कविता

बीरेंद्र कुमार महतो जिला-रांची (झारखंड) से एक स्वरचित कविता सुना रहे हैं जिसका शीर्षक है चाह :
अपना गावं भी अब तो नहीं लगता अपना-
उजाड़ औार वीरान हर तरफ-
सिर्फ बंजर पड़े हैं सारे के सारे खेत-
बूढी दादी भी अब तो नहीं सिझाति धान-
हुआ करती थी कभी वो सूने खलिहानो की शान-
खाली ढन-ढन पड़े हैं सारे के सारे बासन बर्तन-
चूल्हे पर भी नहीं दिखते ताव...

Posted on: May 26, 2016. Tags: Birendra Mahto

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