अपना गावं भी अब तो नहीं लगता अपना...झारखंड से कविता

बीरेंद्र कुमार महतो जिला-रांची (झारखंड) से एक स्वरचित कविता सुना रहे हैं जिसका शीर्षक है चाह :
अपना गावं भी अब तो नहीं लगता अपना-
उजाड़ औार वीरान हर तरफ-
सिर्फ बंजर पड़े हैं सारे के सारे खेत-
बूढी दादी भी अब तो नहीं सिझाति धान-
हुआ करती थी कभी वो सूने खलिहानो की शान-
खाली ढन-ढन पड़े हैं सारे के सारे बासन बर्तन-
चूल्हे पर भी नहीं दिखते ताव...

Posted on: Feb 07, 2018. Tags: Birendra Mahto

झारखण्ड की संस्कृति के साथ हुआ अपमान के बारे में बता रहे हैं-

साथी वीरेंद्र कुमार महतों जिला-रांची (झारखण्ड) से बता रहे हैं कि राज्य संग्रहालय में निमंत्रित कर 20 शोधार्थियों का किया गया अपमान -विश्व संग्राहलय दिवस पर झारखण्ड सरकार के पर्यटन कला संस्कृति व खेलकूद व युवा कार्य विभाग में बुलाया गया लेकिन न तो कार्यक्रम करने दिया और न ही भोजन के लिए पूछा गया।

Posted on: Jun 01, 2016. Tags: Birendra Mahto

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